इसमें कतई कोई शक नहीं है कि गुजरात चुनाव परिणाम भविष्य के लिहाज से
बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे। कांग्रेस के संदर्भ में बात करें तो गुजरात में
सफलता या नजदीकी सफलता भी उसके लिए पुनर्जीवन और नई ऊर्जा का वायस बनेगी। वहीं,
भाजपा के लिए ऐसा होने पर कहीं अधिक चिंता होगी। कारण, ऐसा होने पर प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी की छवि को धक्का पहुंचेगा और यह इस बात का परिचायक होगा कि विकास
पुरुष का उनका नारा फीका पड़ रहा है। आम लोगों ने आर्थिक मोर्चे पर उनकी सरकार
द्वारा उठाए गए कदमों को नकार दिया है।
इतना तय है कि 2017 का गुजरात चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए कई
मायनों में बेहद खास रहेगा। यूं कहें कि भारतीय राजनीति इसे कई कारणों से याद
रखेगी। 2014 लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को गुजरात में पहली बार मजबूत चुनौती मिली।
बिहार में नीतीश कुमार का विकास पुरुष की छवि तो पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की
निजी छवि समेत शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ गुस्सा उसे ले डूबा था।
गुजरात में भाजपा लगभग दो दशकों से अधिक से सत्ता में है। अगर 2002
विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो वह पूरी तरह से सांप्रदायिक रहे। 2007 विधानसभा
चुनाव तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के गुजरात मॉडल पर लड़े गए और
परिणाम भजपा के खाते में गए। 2012 में नरेंद्र मोदी के भावी प्रधानमंत्री बनने के
कारण लगभग एकतरफा रहे। लेकिन 2017 के चुनाव कई मायनों में भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण
हैं। पहले तो भाजपा का प्रबल समर्थक पाटीदार समाज उससे दूर छिटका। युवाओं में
बेरोजगारी का मुद्दा छाया रहा, तो नोटबंदी और जीएसटी ने परंपरागत भाजपाई मतदाता
व्यापारी वर्ग को भी नाराज कर दिया। इन तमाम मोर्चों पर जूझते हुए भाजपा को
हार्दिक पटेल, जिग्नेश मवानी और अल्पेश ठाकुर के रूप में उभरे क्षेत्रीय क्षत्रपों
के दांव-पेंच भी झेलने पड़े।
भविष्य के लिहाज से भाजपा गुजरात का किला ढहते हुए नहीं देख सकती। उसे
अगले साल चार विधान सभा चुनावों का सामना करना है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और
छत्तीसगढ़ में भाजपा की ही सरकार है और लगातार कई सालों से है। इसके अलावा कर्नाटक
में चुनाव होने हैं। कुल मिलाकर इन चार राज्यों की 744 सीटें 2019 के लोकसभा चुनाव
के लिए काफी निर्णायक करार दी जा सकती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी, समेत पार्टी अध्यक्ष अमित शाह समेत तमाम दिग्गज भाजपाई गुजरात में डेरा डाले
रहे। स्वभाविक है भाजपा को गुजरात के परिणामों की गूंज का अहसास है और उसने इसी के
सापेक्ष न सिर्फ अपनी सारी शक्ति झोंक दी, बल्कि साम-दाम-दंड-भेद की नीति भी अपना
ली।
रहा सवाल कांग्रेस का, तो उसके लिए राहत की बात यह है कि गुजरात में
सफलता या नजदीकी सफलता भी राहुल गांधी के कद को एक झटके में बहुत बड़ा कर देगी। इस
तस्वीर के आलोक में अगर यह कहा जाए कि इसके साथ ही राहुल 2019 के प्रधानमंत्री पद
के दावेदार हो जाएंगे, तो गलत नहीं होगा। उनके लिए राहत की बात यह है कि राहुल
गांधी के तेवरों में गुजरात में तीखापन और सटीकता नजर आई है। उनके भविष्य के लिहाज
से यह एक सुखद संकेत हैं।
तो अब इंतजार 18 दिसंबर का है, जब गुजरात का असल चेहरा सामने आएगा।
हां, गुजरात में दूसरे चरण का मतदान खत्म होने के साथ ही कई एक्जिट पोल आए, लेकिन
उन्हें बिल्कुल सही करार देना बेहद जल्दबाजी होगा। इसकी एक बड़ी वजह यही है कि
बड़े से बड़े सीफोलॉजिस्ट को एक न एक बार मुंह की खानी पड़ती है। और, गुजरात चुनाव
परिणाम उनके लिए कुछ ऐसा ही साबित हो सकते हैं।

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