जन्म के पहले से ही भारत को अपना दुश्मन मान चुके पाकिस्तान से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। नजरबंदी का उपयुक्त कारण पेश करने में अक्षम साबित हुई पाकिस्तान सरकार को अंतत: पंजाब न्यायिक बोर्ड के आदेश पर मुंबई हमलों के मास्टर माइंड और प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और फिलहाल जमात-उद-दावा के अमीर हाफिज सईद को रिहा करना पड़ा। हाफिज के मसले पर पाकिस्तान का रवैया शुरुआत से ही दोगलेपन का रहा। नजरबंदी के आदेश के वक्त भी सईद पर आतंक विरोधी कार्रवाई का नहीं अपितु मामूली कानून-व्यवस्था बिगड़ने के आरोप मढ़े गए थे। इन आरोपों के चलते 300 दिन से बंद हाफिज बुधवार को रिहा हो जाता है। वजह, पंजाब सरकार अदालत को न तो उसके खिलाफ कोई सबूत पेश कर पाती है और ना ही कोई और आरोप लगा पाती है। वह भी तब जब संयुक्त राष्ट्र समेत अमेरिका ने हाफिज सईद पर आतंकी कार्रवाई में लिप्त रहने के लिए 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा हुआ है।
जैसा अपेक्षित था शुक्रवार को लाहौर के जौहर शहर में हाफिज अपने घर के बाहर अपने समर्थकों से मिला। केक काटा, भारत विरोधी नारे लगाए और कश्मीर की आजादी का संकल्प लिया। हाफिज सईद की रिहाई यह भी बताती है कि लाख अंतर्राष्ट्रीय दबावों के पाकिस्तान आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगार बना रहेगा। भले ही तमाम अमेरिकी सिनेटर पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक मदद रोकने की मांग करें या इसके एवज में प्रभावी कदम उठाने की अपेक्षा जताए, पाकिस्तान आतंक को प्रायोजित करने की अपनी नीति से पीछे हटने वाला नहीं है। वह भी तब जब भारत संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम वैश्विक मंचों से आतंक के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान का कच्चा-चिट्ठा खोल चुका है और जमकर पाकिस्तानी हुक्मरानों समेत आईएसआई को खरी-खोटी सुना चुका है।
हाफिज की रिहाई जिन प्रावधानों के तहत हुई उस पर गौर करना भी जरूरी है। हाफिज के खिलाफ एक भी सुबूत पेश नहीं किया गया। यहां तक अजमल कसाब की स्वीकारोक्ति या मुंबई आतंकी हमलों से जुड़े सबूत भी अदालत के समक्ष नहीं रखे गए। यह तब है जब पाकिस्तान अखबार द डॉन के मुताबिक इसकी प्रबल संभावना थी कि पंजाब सरकार हाफिज के खिलाफ नए सबूत पेश कर उसकी गिरफ्तारी की अवधि बढ़वाने में सफल रहेगी।
हालांकि हाफिज की रिहाई को पाकिस्तान के बदले अंदरूनी हालातों से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। वहां अगले साल आमचुनाव होने हैं और पनामा पेपर के चलते प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने को मजबूर हुए नवाज शरीफ की ताकत क्षीण पड़ी है। ऐसे में पाकिस्तानी खुफिया संस्था आईएसआई हाफिज को रिहाई सुनिश्चित करती है, तो इसके भी अपने निहितार्थ हैं। वहां परोक्ष-अपरोक्ष रूप से सत्ता की चाबी सैन्य प्रतिष्ठान के हाथों ही रही है। नवाज शरीफ या उनसे पहले बेनजीर भुट्टो ने अपनी अलग राह चुनने की कोशिश की थी, तो दोनों ही का हश्र पूरी दुनिया देख चुकी है।
हालिया घटनाक्रम से इतना तो साफ हो गया है कि आतंक से खुद को पीड़ित बताने का पाकिस्तान का आलाप सिर्फ और सिर्फ दुनिया को गुमराह करने का एक छलावा भर है। उसकी न तो ऐसी इच्छा है और ना ही कोई इरादा। हाफिज सईद की रिहाई से पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार के लिए भी कम सिरदर्द पैदा नहीं होगा। साथ ही इस दोगलेपन के साथ पाकिस्तान ने एक बार फिर जता दिया है कि वह न सिर्फ आतंक की फैक्ट्री है, बल्कि एक तरह से आतंकवादियों द्वारा चलाया जा रहा देश भी। इस तरफ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को तुरंत ध्यान देना होगा। खासकर जब रिहा होते ही हाफिज सईद खुलेआम सड़कों पर भारत, अमेरिका के विरोध समेत कश्मीर की आजादी का नारा बुलंद करवा रहा है। यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हाफिज सईद को मुंबई आतंकी हमलों के ठीक बाद गिरफ्तार किया गया, लेकिन छह महीने बाद जून 1999 में उसे रिहा कर दिया गया था। दोगलेपन का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा...
जैसा अपेक्षित था शुक्रवार को लाहौर के जौहर शहर में हाफिज अपने घर के बाहर अपने समर्थकों से मिला। केक काटा, भारत विरोधी नारे लगाए और कश्मीर की आजादी का संकल्प लिया। हाफिज सईद की रिहाई यह भी बताती है कि लाख अंतर्राष्ट्रीय दबावों के पाकिस्तान आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगार बना रहेगा। भले ही तमाम अमेरिकी सिनेटर पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक मदद रोकने की मांग करें या इसके एवज में प्रभावी कदम उठाने की अपेक्षा जताए, पाकिस्तान आतंक को प्रायोजित करने की अपनी नीति से पीछे हटने वाला नहीं है। वह भी तब जब भारत संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम वैश्विक मंचों से आतंक के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान का कच्चा-चिट्ठा खोल चुका है और जमकर पाकिस्तानी हुक्मरानों समेत आईएसआई को खरी-खोटी सुना चुका है।
हाफिज की रिहाई जिन प्रावधानों के तहत हुई उस पर गौर करना भी जरूरी है। हाफिज के खिलाफ एक भी सुबूत पेश नहीं किया गया। यहां तक अजमल कसाब की स्वीकारोक्ति या मुंबई आतंकी हमलों से जुड़े सबूत भी अदालत के समक्ष नहीं रखे गए। यह तब है जब पाकिस्तान अखबार द डॉन के मुताबिक इसकी प्रबल संभावना थी कि पंजाब सरकार हाफिज के खिलाफ नए सबूत पेश कर उसकी गिरफ्तारी की अवधि बढ़वाने में सफल रहेगी।
हालांकि हाफिज की रिहाई को पाकिस्तान के बदले अंदरूनी हालातों से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। वहां अगले साल आमचुनाव होने हैं और पनामा पेपर के चलते प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने को मजबूर हुए नवाज शरीफ की ताकत क्षीण पड़ी है। ऐसे में पाकिस्तानी खुफिया संस्था आईएसआई हाफिज को रिहाई सुनिश्चित करती है, तो इसके भी अपने निहितार्थ हैं। वहां परोक्ष-अपरोक्ष रूप से सत्ता की चाबी सैन्य प्रतिष्ठान के हाथों ही रही है। नवाज शरीफ या उनसे पहले बेनजीर भुट्टो ने अपनी अलग राह चुनने की कोशिश की थी, तो दोनों ही का हश्र पूरी दुनिया देख चुकी है।
हालिया घटनाक्रम से इतना तो साफ हो गया है कि आतंक से खुद को पीड़ित बताने का पाकिस्तान का आलाप सिर्फ और सिर्फ दुनिया को गुमराह करने का एक छलावा भर है। उसकी न तो ऐसी इच्छा है और ना ही कोई इरादा। हाफिज सईद की रिहाई से पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार के लिए भी कम सिरदर्द पैदा नहीं होगा। साथ ही इस दोगलेपन के साथ पाकिस्तान ने एक बार फिर जता दिया है कि वह न सिर्फ आतंक की फैक्ट्री है, बल्कि एक तरह से आतंकवादियों द्वारा चलाया जा रहा देश भी। इस तरफ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को तुरंत ध्यान देना होगा। खासकर जब रिहा होते ही हाफिज सईद खुलेआम सड़कों पर भारत, अमेरिका के विरोध समेत कश्मीर की आजादी का नारा बुलंद करवा रहा है। यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हाफिज सईद को मुंबई आतंकी हमलों के ठीक बाद गिरफ्तार किया गया, लेकिन छह महीने बाद जून 1999 में उसे रिहा कर दिया गया था। दोगलेपन का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा...



