Sunday, November 26, 2017

हाफिज सईद की रिहाई पाकिस्तान के दोगलेपन का प्रतीक

जन्म के पहले से ही भारत को अपना दुश्मन मान चुके पाकिस्तान से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। नजरबंदी का उपयुक्त कारण पेश करने में अक्षम साबित हुई पाकिस्तान सरकार को अंतत: पंजाब न्यायिक बोर्ड के आदेश पर मुंबई हमलों के मास्टर माइंड और प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और फिलहाल जमात-उद-दावा के अमीर हाफिज सईद को रिहा करना पड़ा। हाफिज के मसले पर पाकिस्तान का रवैया शुरुआत से ही दोगलेपन का रहा। नजरबंदी के आदेश के वक्त भी सईद पर आतंक विरोधी कार्रवाई का नहीं अपितु मामूली कानून-व्यवस्था बिगड़ने के आरोप मढ़े गए थे। इन आरोपों के चलते 300 दिन से बंद हाफिज बुधवार को रिहा हो जाता है। वजह, पंजाब सरकार अदालत को न तो उसके खिलाफ कोई सबूत पेश कर पाती है और ना ही कोई और आरोप लगा पाती है। वह भी तब जब संयुक्त राष्ट्र समेत अमेरिका ने हाफिज सईद पर आतंकी कार्रवाई में लिप्त रहने के लिए 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा हुआ है।
जैसा अपेक्षित था शुक्रवार को लाहौर के जौहर शहर में हाफिज अपने घर के बाहर अपने समर्थकों से मिला। केक काटा, भारत विरोधी नारे लगाए और कश्मीर की आजादी का संकल्प लिया। हाफिज सईद की रिहाई यह भी बताती है कि लाख अंतर्राष्ट्रीय दबावों के पाकिस्तान आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगार बना रहेगा। भले ही तमाम अमेरिकी सिनेटर पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक मदद रोकने की मांग करें या इसके एवज में प्रभावी कदम उठाने की अपेक्षा जताए, पाकिस्तान आतंक को प्रायोजित करने की अपनी नीति से पीछे हटने वाला नहीं है। वह भी तब जब भारत संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम वैश्विक मंचों से आतंक के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान का कच्चा-चिट्ठा खोल चुका है और जमकर पाकिस्तानी हुक्मरानों समेत आईएसआई को खरी-खोटी सुना चुका है।
हाफिज की रिहाई जिन प्रावधानों के तहत हुई उस पर गौर करना भी जरूरी है। हाफिज के खिलाफ एक भी सुबूत पेश नहीं किया गया। यहां तक अजमल कसाब की स्वीकारोक्ति या मुंबई आतंकी हमलों से जुड़े सबूत भी अदालत के समक्ष नहीं रखे गए। यह तब है जब पाकिस्तान अखबार द डॉन के मुताबिक इसकी प्रबल संभावना थी कि पंजाब सरकार हाफिज के खिलाफ नए सबूत पेश कर उसकी गिरफ्तारी की अवधि बढ़वाने में सफल रहेगी।
हालांकि हाफिज की रिहाई को पाकिस्तान के बदले अंदरूनी हालातों से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। वहां अगले साल आमचुनाव होने हैं और पनामा पेपर के चलते प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने को मजबूर हुए नवाज शरीफ की ताकत क्षीण पड़ी है। ऐसे में पाकिस्तानी खुफिया संस्था आईएसआई हाफिज को रिहाई सुनिश्चित करती है, तो इसके भी अपने निहितार्थ हैं। वहां परोक्ष-अपरोक्ष रूप से सत्ता की चाबी सैन्य प्रतिष्ठान के हाथों ही रही है। नवाज शरीफ या उनसे पहले बेनजीर भुट्टो ने अपनी अलग राह चुनने की कोशिश की थी, तो दोनों ही का हश्र पूरी दुनिया देख चुकी है।
हालिया घटनाक्रम से इतना तो साफ हो गया है कि आतंक से खुद को पीड़ित बताने का पाकिस्तान का आलाप सिर्फ और सिर्फ दुनिया को गुमराह करने का एक छलावा भर है। उसकी न तो ऐसी इच्छा है और ना ही कोई इरादा। हाफिज सईद की रिहाई से पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार के लिए भी कम सिरदर्द पैदा नहीं होगा। साथ ही इस दोगलेपन के साथ पाकिस्तान ने एक बार फिर जता दिया है कि वह न सिर्फ आतंक की फैक्ट्री है, बल्कि एक तरह से आतंकवादियों द्वारा चलाया जा रहा देश भी। इस तरफ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को तुरंत ध्यान देना होगा। खासकर जब रिहा होते ही हाफिज सईद खुलेआम सड़कों पर भारत, अमेरिका के विरोध समेत कश्मीर की आजादी का नारा बुलंद करवा रहा है। यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हाफिज सईद को मुंबई आतंकी हमलों के ठीक बाद गिरफ्तार किया गया, लेकिन छह महीने बाद जून 1999 में उसे रिहा कर दिया गया था। दोगलेपन का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा...

Tuesday, November 21, 2017

पद्मावती का प्रदर्शन टालने का फैसला अमेरिका से आया, अब 2018 में आएगी

फिल्म को लेकर चल रही बयानबाजी और विरोध-प्रदर्शनों के बीच पद्मावती का प्रदर्शन टालने का फैसला निर्देशक संजय लीला भंसाली का नहीं था। यह निर्णय फिल्म के निर्माताओं का था, जिन्होंने भंसाली को सिर्फ सूचित भर किया।
भंसाली के बेहद करीबी निजी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक 'आने वाले महीनों में किसी और शुक्रवार' फिल्म को प्रदर्शित करने का फैसला उन्हें मोबाइल पर सुनाया गया। इसके जवाब में भंसाली ने सिर्फ 'ओके' कहकर फोन काट दिया। इस कॉल के साथ ही उनके लिए तय समय पर फिल्म के प्रदर्शन की लड़ाई खत्म हो गई।
'फिल्म के प्रदर्शन को टालने के संबंध में ना तो कोई सफाई भंसाली को दी गई और ना ही उन्होंने मांगी।' विवाद की इस लड़ाई में भंसाली की एक नहीं चली। अब उन्होंने पूरा मामला फिल्म के सक्षम निर्माताओं वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स के मजबूत हाथों में छोड़ दिया है। यह अलग बात है कि रविवार को इस बाबत कंपनी के अधिकृत बयान ने पद्मावती की पूरी की पूरी क्रू और स्टारकास्ट को झटका जरूर दे दिया।
चालू बयानबाजियों और राजनीति के बीच एक सवाल जरूर सिर उठा रहा है कि आखिर वायकॉम को त्वरित गति से यह निर्णय लेना क्यों पड़ा? एक सूत्र के मुताबिक एसएलबी (संजय लीला भंसाली) की ओर से रिकॉर्ड किए गए एक वीडियो रूपी सफाई के बावजूद मामला शांत होते नहीं देख वायकॉम प्रबंधन की पेशानी पर बल पड़ गए। इस वीडियो में भंसाली ने न सिर्फ रानी पद्मावती की महिमा का बखान किया, बल्कि यह आश्वासन भी दिया कि फिल्म में किसी तरह से किसी भी ऐतिहासिक शख्स का अपमान नहीं किया गया है। इस सफाई के बावजूद सामने आने वाली धमकियों और चेतावनियों की आंच वायकॉम के अमेरिका स्थित मुख्यालय तक जा पहुंची।
पद्मावती की विषयवस्तु में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है कि बारंबार सफाई के बावजूद विवाद भड़कता देखकर अमेरिकी मुख्यालय ने फिल्म का प्रदर्शन टालने का फैसला कर लिया।
यही नहीं, फिल्म से जुड़े विवादों को खत्म करने की आखिरी कोशिश वास्तव में ताबूत में आखिरी कील की तरह साबित हुई। यह कोशिश रही भंसाली के प्रोडक्शन की महत्वपूर्ण सदस्य शोभा संत की अर्णब गोस्वामी, रजत शर्मा समेत कुछ पत्रकारों को फिल्म दिखाने की। इसके बाद अर्णब की अपने शो पर दिलेरी, 'मैंने फिल्म देखी है, आपने नहीं' बैकफायर कर गई। यहीं से मामला और बिगड़ गया।
अंत में सीबीएफसी प्रमुख प्रसून जोशी के बयान ने रही सही कसर पूरी कर दी। पद्मावती को लेकर तेज हो रहे विवादों से प्रसून खासे दबाव में थे। ऐसे में कुछ पत्रकारों को फिल्म दिखाना उन्हें रास नहीं आया और उन्होंने इसको लेकर अपनी नाखुशी सार्वजनिक कर दी।
सूत्र यह भी बताते हैं कि गुजरात चुनाव होने तक फिल्म का प्रदर्शन किसी सूरत में नहीं हो सकता था। ऐसे में फिल्म की पब्लिसिटी कॉस्ट भी बढ़नी तय थी। यही सभी देखकर वायकॉम के आलाकमान ने फिल्म के प्रदर्शन की तारीख बगैर किसी विलंब के टालने का फरमान जारी कर दिया।
अब क्या? सूत्र बताते हैं कि वायकॉम के नीति-निर्धारक फिलहाल किसी जल्दबाजी में नहीं है। वह स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और उसी के अनुरूप आगे का निर्णय करेंगे।

Monday, November 20, 2017

देश को सात प्रधानमंत्री देने वाली कांग्रेस के 133 सालों के इतिहास में 42 साल रहा गांधी परिवार का पार्टी अध्यक्ष

राहुल गांधी की बतौर पार्टी अध्यक्ष ताजपोशी की महज औपचारिकता ही बाकी है। इस तरह वह इस विरासत को संभालने वाले गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी के सदस्य होंगे। कांग्रेस की स्थापना के 133 सालों के इतिहास में कुल 42 साल तक पार्टी अध्यक्ष पद पर गांधी परिवार के ही किसी न किसी सदस्य कब्जा रहा है।
भूतपूवर् प्रधानमंत्री राजीव गांधी की असामयिक मौत के बाद 'कभी हां-कभी ना' वाला रवैया अख्तियार करने वाली सोनिया गांधी ने तो अध्यक्ष पद पर बने रहने के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। 1998 में पार्टी अध्यक्ष संभालने के बाद से सोनिया ही इस पर काबिज रहीं। एक समय था जब पार्टी अध्यक्ष के लिए हर साल चुनाव होते थे, लेकिन देश-काल-परिस्थितयों में आए बदलाव से यह परंपरा भी बदल गई। फिलहाल तो कांग्रेस यानी गांधी परिवार हो गया है।

गांधी परिवार से कांग्रेस अध्यक्ष

गौरतलब है कि 1885 में एओ ह्यूम ने कांग्रेस पार्टी की नींव रखी थी। उस समय व्योमेश चंद्र बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष चुना गया था। गांधी परिवार की ओर से पहली बार यह पद मोतीलाल नेहरू ने 1919 में संभाला था। वह 1928 में भी पार्टी अध्यक्ष चुने गए। हालांकि महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 के बाद कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन की पर्याय बन गई। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के डेढ़ करोड़ सदस्य थे, जबकि कार्यकर्ताओं की संख्या सात करोड़ के आसपास थी।
खैर, मोतीलाल जी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1936 और 1937 में आजादी के पहले पार्टी अध्यक्ष पद संभाला था। आजादी के बाद पंडित नेहरू 1951 में एक बार फिर पार्टी अध्यक्ष बने और 54 तक रहे। उनकी मौत के बाद इंदिरा गांधी ने 1959 में पार्टी अध्यक्ष संभाला। इसके बाद वह 1978 से 1984 तक इस पद को सुशभित करती रहीं।
इंदिरा गांधी की मौत के बाद एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री बने राजीन गांधी को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई। उन्होंने भी अपनी असामयिक मौत तक यानी 1991 तक प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष की दोहरी जिम्मेदारी निभाई। राजीव गांधी की मौत के बाद कांग्रेस को गांधी का पर्याय मानने वाले सोनिया गांधी से सक्रिय राजनीति में उतरने का बारंबार आग्रह करते रहे, लेकिन सोनिया ने ऐसी कोई सक्रियता नहीं दिखाई। हालांकि जबर्दस्त दबाव के बीच उन्होंने 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाल ही लिया। तब से लेकर अभी तक वह लगातार इस पद को सुशोभित करती आ रही हैं। उनके बाद भी अब यह जिम्मेदारी गांधी परिवार के ही राहुल गांधी संभालेंगे। कब तक, इस सवाल का जवाब भविष्य की गर्त में छिपा है।

कांग्रेस का आजाद भारत में दबदबा

आजादी के बाद से कांग्रेस ही अधिकांश समय केंद्र में सरकार बनाती आई है। सिर्फ केंद्र ही नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों में भी कांग्रेस ही तूती बोलती थी। कांग्रेस ने केंद्र में आधा दजर्न बार अपने बहुमत से सरकार बनाई, तो चार बार गठबंधन सरकार बनाई। कांग्रेस ने केंद्र को अब तक सात प्रधानमंत्री दिए हैं। हालांकि कांग्रेस अब सिकुड़ रही है और इसी बात को समझते हुए पार्टी हाईकमान ने नेतृत्व में बदलाव का फैसला लिया है। 

राहुल की चुनौतियां

सबसे पहले तो उन्हें कांग्रेस मतलब गांधी परिवार के मिथक को तोड़ना होगा। इसके लिए उन्हें नए-नए चेहरों को न सिर्फ भरपूर मौका देना होगा, बल्कि मणिशंकर अय्यर के उस बयान को भी झूठा साबित करना होगा, जिसमें मणि ने कहा था, 'कांग्रेस में सिर्फ दो लोग ही अध्यक्ष बन सकते हैं-मां या बेटा।' उन्हें ज्योतिरादित्य सिधिंया और सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं को आगे लाना होगा। इसके लिए उन्हें सोनिया के विश्वासपात्र नेताओं से न सिर्फ दूरी बनानी होगी, बल्कि उनकी सोच नहीं, अपनी सोच से चलना होगा। राहुल गांधी ने ऐसे कई मुद्दे उठाए, जो न सिर्फ प्रभावी थे, बल्कि आम आदमी से जुड़े भी थे। यह अलग बात है कि एक-दो बार बयानबाजी कर राहुल शांत हो गए। उन्हें अब इससे बचना होगा और मसलों या मुद्दों को अंजाम तक पहुंचाना होगा। कांग्रेस की अल्पसंख्यक या दलित वोट पर निर्भरता खत्म कर सभी के लिए समग्र सोच वाले एजेंडे पर चलना होगा।

मथाई की आत्मकथा का 'शी' चैप्टर इंदिरा से उनके संबंधों का लेखा-जोखा था

इतिहास के गलियारे अंधेरे से भरे होते हैं। ऐसे में जब कोई एक रोशनी की किरण उनके भीतर जाती है, तो कुछ ऐसा सामने आता है जो यकीन से परे होता है। कुछ ऐसा ही हुआ जब जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव रहे एमओ मथाई की आत्मकथा 'रेमिनेसेंसिस आफ द नेहरू ऐज' 1978 में प्रकाशित हुई।
इस किताब के बाजार में आते ही देश भर का राजनीतिक माहौल अचानक से गर्म हो उठा। वजह सिर्फ यह नहीं थी कि इसमें किन-किन बातों का खुलासा किया गया था। असल वजह थी कि क्या छिपाया गया था? यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी सत्ता से बेदखल हो चुकी थीं और आपातकाल के कारण उनके खिलाफ एक नकारात्मक माहौल जनमानस के सामने था।
इस रहस्य और उससे जुड़ी चर्चाओं को हवा दी थी इस किताब के एक चैप्टर 'शी' ने। चैप्टर के नाम पर किताब के प्रकाशक नरेंद्र कुमार का एक नोट था। इस नोट के मुताबिक 'यह चैप्टर लेखक के बेहद निजी अनुभवों का लेखा-जोखा है, जिसे उन्होंने डीएच लॉरेंस की शैली में लिखा था। साथ ही जिसे लेखक के ऐन मौके मन बदलने के कारण हटाना पड़ा।'
माना जाता है कि 'शी' नाम के इस चैप्टर में मथाई और इंदिरा गांधी के लगभग 12 साल चले अंतरंग संबंधों का लेखा-जोखा था। इन तमाम कयासों के बीच इंदिरा गांधी की अधिकृत आत्मकथा की लेखिका कैथरीन फ्रैंक ने भी स्वीकार किया था। उनके मुताबिक 'मथाई की आत्मकथा में इंदिरा गांधी के साथ उनके संबंधों का विवरण था, जिसे प्रकाशन से पहले खुद मथाई ने रोक दिया था।'
इस किस्से को और हवा तब मिली थी जब आईबी के भूतपूर्व निदेशक टीवी राजेश्वर ने करण थापर को दिए एक साक्षात्कार में कुबूल किया था कि मथाई ने उन्हें किताब का एक 'चैप्टर' दिया था, जिसे उन्होंने 1981 में इंदिरा गांधी के सुपुर्द कर दिया था।
1981 में मथाई की मौत के साथ ही उनकी आत्मकथा में दर्ज चैप्टर 'शी' का मजमूं भी दफन हो गया। हालांकि आज भी इसको लेकर कयासों का दौर जारी है।