Wednesday, December 6, 2017

सबसे पहले राजीव ने किया ‘राम राज्य’ का वादा, 1989 में कराया राम मंदिर का शिलान्यास

भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपने संस्मरणों के दूसरे भाग द टर्ब्यूलेंट यर्स: 1980-96 में प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के दिनों की यादों को ताजा किया है। उन्होंने इस किताब में अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के ताला खुलवाने के निर्णय को न सिर्फ गलत निर्णय करार दिया, बल्कि उस प्रकरण को पूर्ण विश्वासघात भी करार दिया। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आए थे। उस वक्त उनके प्रमुख रणनीतिकार अर्जुन सिंह ने 1989 में चुनावी जीत के लिए हिंदुओं के ध्रुवीकरण को सर्वोच्च प्रथामिकता दी थी। इस फेर में कांग्रेस लगातार गलती पर गलती करती गई।
शुरुआत की उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीर बहादुर सिंह पर 1986 में दबाव बनाकर विवादास्पद ढांचे का ताला खुलवाकर। इसके बाद 10 नवंबर 1989 को शिलान्यास कार्यक्रम कर बकायदा पूजा-अर्चना की शुरुआत भी कांग्रेस के शासन में ही हुई। उस समय उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक आरपी जोशी हुआ करते थे। उनकी गिनती नियम-कायदों से चलने वाले अधिकारियों में होती थी। आरपी जोशी ने भी एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता से निजी बातचीत में स्वीकार किया था, केंद्र सरकार के निर्णय से उनके हाथ बंधे हुए थे और उनके पास दिल्ली और लखनऊ का आदेश मानने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था।
उस वक्त राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। बूटा सिंह गृह मंत्री हुआ करते थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर नारायण दत्त तिवारी विराजमान थे। हिदूं वोटो के ध्रुवीकरण के लिए राजीव गांधी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत अयोध्या से राम राज्य लाने के वादे से की थी। हालांकि उस वक्त यह बहुत बड़ा रहस्य था कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की सिरे से अवहेलना कर आखिर शिलान्यास कार्यक्रम को अंजाम कैसे दिया गया। सर्वोच्च अदालत के ही आदेश ने विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों के विवदास्पद ढांचे पर कुछ करने से रोका हुआ था।
उस वक्त राजनीतिक गलियारों में कई सवाल तैरा करते थे। मसलन, क्या राजीव गांधी एनडी तिवारी के साथ निजी तौर पर इस पूरे प्रकरण को अंजाम देने में शामिल थे? हालांकि उस प्रकरण का राज खोला विद्रोही के अवतार में सामने आए एनडी तिवारी ने। 1995 में एनडी तिवारी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था। उनकी जद्दोजेहद अपनी खोई राजनीतिक जमीन की तलाश की ही थी। ऐसे ही मोड़ पर उन्होंने 1989 में शिलान्यास का राज खोला।
इस राज से साफ हो गया था कि राम मंदिर विवाद को हवा देने में कांग्रेस का ही हाथ रहा। एनडी तिवारी के मुताबिक उक्त दोनों ही मामलों में बूटा सिंह ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। पता चला कि अयोध्या में शिलान्यास से ठीक एक हफ्ते पहले बूटा सिंह ने गोरखपुर में राजीव गांधी की देवराह बाबा से मुलाकात कराई थी। इसकी गुपचुप व्यवस्था उत्तर प्रदेश के एक शीर्ष आईपीएस अधिकारी ने कराई थी, जो खुद बाबा के परम भक्त थे।
देवराह बाबा का उत्तर प्रदेश में जबर्दस्त प्रभाव था। यही नहीं, वह अपने भक्तों के माथे पर अपना पैर छुआ कर आशीर्वाद देने के लिए भी प्रसिद्ध थे। बताते हैं राजीव गांधी ने न सिर्फ बाबा का आशीर्वाद लिया, बल्कि अयोध्या मसले पर बाबा की राय भी मानी। बाबा ने राजीव गांधी से सिर्फ एक ही वाक्य कहा था, बच्चा हो जाने दे। बकौल एनडी तिवारी और नवंबर 1989 को शिलान्यास बच्चे ने हो जाने दिया




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