Tuesday, September 16, 2014

अंग्रेज चले गए, अंग्रेजियत अभी भी बाकी है

पढऩे-सुनने में अजीब लगा ना. लेकिन सच है. इसका अहसास मुझे भी हुआ. कुछ-एक दिन पहले लखनऊ के एक प्रतिष्ठित क्लब में जाना हुआ. मेरे साथ एमएनसी में काम करने वाले बाहर से आए कुछ दोस्त थे. वे फॉर्मल ड्रेस में थे लेकिन मैं स्पोट्र्स शूज पहने था. बस रिसेप्शन पर इसी कारण रोक लिया गया. कहा गया लेदर शूज पहनने होंगे. मरता क्या न करता बीस रुपए देकर वहीं से किराए के लेदर शूज लिए और क्लब के अंदर चला गया. लेकन यह बात मन में कौंधती रही. रात को घर लौटा तो ऐसी ही एक और घटना वेट कर रही थी. एक इंग्लिश न्यूज चैनल पर मद्रास हाईकोर्ट के जज और दो सीनियर एडवोकेट की खबर फ्लैश हो रही थी. खबर के मुताबिक इन तीन लोगों को महज धोती और स्लीपर्स पहने होने के कारण तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन (टीएनसीए) की बिल्डिंग में प्रवेश नहीं दिया गया. मुझे अपने साथ पेश आई घटना याद हो आई. लगा कि जब हाईकोर्ट के जज को रोका जा सकता है, तो मेरी बिसात ही क्या है.
अगले दिन मेरे मन में यह बात गहरे पैठ चुकी थी कि 'रूल इज रूलÓ के नाम पर ऐसी कितनी घटनाएं हुईं, उनके बारे में जानकारी की जाए. नतीजतन सबसे पहले हाथ लगा न्यूयॉर्क टाइम्स के आर्काइव में ३ जुलाई १९९८ को प्रकाशित सुनंदा के. दत्ता राय का लेख. इसमें अपने शहर के पड़ोसी जिले यानी कानपुर के एक वाकये का जिक्र मिला. इस वाकये के मुताबिक १९६३ में एरिक न्यूबाय नामक इंग्लिश ट्रैवल राइटर कानपुर क्लब पहुंचे. उन्होंने वहां एक रूम की दरकार की, तो रिसेप्शनिस्ट, जो कि खुद एक इंडियन था, ने उनसे क्लब के एक मेंबर का इंट्रोडक्शन मांगा. जवाब में एरिक साहब ने तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर जवाहर लाल नेहरू का लेटर ऑफ इंट्रोडक्शन दिखाया, लेकिन रिसेप्शनिस्ट ने यह कह कर रूम देने से इंकार कर दिया कि नेहरूजी उनके क्लब के मेंबर नहीं हैं. है न कमाल. ब्रिटिश काल के उस क्लब के रूल्स एंड रेग्युलेशंस तब आजादी के १६ साल बाद भी जारी थे.
कुछ साल पहले दिल्ली जिमखाना क्लब में धोती पहने एक युवा सांसद को इसी कारण रोक दिया गया था, तो कुछ और साल पहले महान चित्रकार एमएफ हुसैन साहब को बॉम्बे जिमखाना में प्रवेश नहीं दिया गया. महज इसलिए कि उन्होंने नंगे पैर चलने का अपना नियम तोडऩे से इंकार कर दिया था. २००२ की ही बात है बेंगलुरू के नेशनल लॉ स्कूल के हेड प्रोफेसर जी मोहन गोपाल को बैंगलोर क्लब में घुसने नहीं दिया. वजह बनी उनकी धोती. वह भी उस दिन जब वह वहां गणतंत्र दिवस समारोह के गणमान्य अतिथि बतौर पहुंचे थे. इसी क्लब में इस घटना के एक साल पहले सत्यजीत रे के भतीजे अशोक चटर्जी को इसी 'गुनाहÓ की सजा भुगतनी पड़ी थी.
आजाद भारत का यह एक दुर्भाग्य कह सकते हैं कि ड्रेस कोड के नाम पर आज भी लगभग हर सिटी के चुनिंदा क्लब्स में अंग्रेजियत ही हावी है. संभवत: इसकी वजह इन क्लब्स का ब्रिटिश काल से जुड़ा होना हैै. उस दौर में ऐसे क्लब में इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट अलाउड की तख्तियां लगी रहती थी. यानी उस दौर में इन क्लब में जाने वाले समाज के एलीट ही हुआ करते थे. लेकिन आजाद भारत में अब ऐसी परंपरा का क्या औचित्य? खासकर जब हमारा संविधान सभी को बराबरी का अधिकार देता है. मौलिक अधिकारों के इस दौर में क्या किसी खास पोशाक पहने होने के कारण आपके साथ भेदभाव किया जा सकता है? वह भी सिर्फ इसलिए कि भेदभाव करने वाले स्वयं को पहनावे के कारण श्रेष्ठ मानते हैं.
एक और वाकया बताना चाहूंगा. बात उस दौर की है जब संविधान सभा में मौलिक अधिकारों के दायरे पर चर्चा चल रही थी. रोहिणी कुमार चौधरी ने अंग्रेजों के बनाए भेदभाव संबंधी नियम-कानूनों में संशोधन की बात की थी. उनका आशय तत्कालीन अंग्रेजों के जमाने के क्लबों में लागू ड्रेस कोड से था. इस पर सरदार पटेल ने इस संशोधन प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा था कि वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिससे दुनिया में संदेश जाए कि हमें अपने ही नागरिकों के साथ व्यवहार करना नहीं आता.
आज लगता है कि रोहिणी कुमार का आशंकाएं सच साबित हो रही हैं. लगभग हर एलीट क्लब में ड्रेस कोड के नाम पर तमाम नियम कायदे लागू हैं. यहां तक सिटी में होने वाले सोशल इवेंट्स तक में ड्रेस कोड का पालन करने वाला निर्देश बड़े अक्षरों में लिखा होता है. ऐसा लगता है कि अंग्रेज तो चले गए, लेकिन उनकी आम भारतीयों के साथ भेदभाव करने वाली नीतियां आज भी जारी हैं. ऐसे में जयललिता तमिल संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसे क्लब के लिए ड्रेस कोड संबंधी नया कानून लाने जा रही हैं. क्या शेष राज्य भी भारतीयता को अंगीकार कर चलने वाले नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए कुछ ऐसा ही कदम उठाएंगे. अंग्रेजी को तरजीह देने वाले इस समाज से यह उम्मीद बेमानी सी लगती है. क्या कहते हैं आप...

जवाहिरी या बगदादी नहीं पाकिस्तान पर नजर रखिए

अमेरिका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की एकेमेडिशियन क्रिस्टीन फेयर की एक किताब है 'फाइटिंग टू द एंड: द पाकिस्तान आर्मीज वे ऑफ वॉर' इसमें उन्होंने पाकिस्तान को दी जाने वाली अमेरिकी मदद और उसके एक बड़े हिस्से का प्रयोग भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए किए जाने का जिक्र किया है. यह सच भी है. इस रोशनी में पाकिस्तान में बीते लगभग तीन हफ्तों के हालात और थर्सडे को सामने आए अल कायदा के भारत में शाखा खोलने वाले वीडियो को आपस में जोड़कर भी देखा जा सकता है. अलकायदा की आधिकारिक तौर पर अफ्रीका के सहारा क्षेत्र, पूर्वी अफ्रीका, यमन और सीरिया के बाद यह पांचवी ब्रांच होगी. अल कायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी की इस घोषणा को कुछ सुरक्षा विशेषज्ञ इराक और सीरिया में सक्रिय आतंकी संगठन आईएस के बढ़ते वर्चस्व के काउंटर के तौर पर भी देख रहे हैं.
ऐसा हो भी सकता है, लेकिन हम इसे हल्के में नहीं ले सकते हैं. इसलिए और भी नहीं कि वैश्विक आतंकवाद के पर्याय बने अल कायदा और आईएस को एक समय खाद-पानी पहुंचाने का काम पश्चिम खासकर अमेरिका ने ही किया था. इन्हीं बातों का जिक्र क्रिस्टीन अपनी किताब में कर चुकी हैं. अमेरिका ने सबसे पहले अफगानिस्तान में रूसी प्रभुत्व को खत्म करने के लिए अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को मदद पहुंचाई. इसी तरह सीरिया में असद शासन के खिलाफ आईएस को खड़ा किया. लेकिन, बदलते वैश्विक परिदृश्य में यही दो आतंकी गुट दुनिया भर की शांति के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं.
भारत के लिए यह चुनौती समय रहते चेत जाने से जुड़ी है. जवाहिरी ने भारत में अल कायदा की ब्रांच का सरगना पकिस्तानी उग्रवादी असिम उमर को बताया है, जो शीर्ष तालिबानी नेता मुल्ला उमर को रिपोर्ट करेगा. इसी मुल्ला उमर का संबंध पाकिस्तानी तालिबानी से भी बताया जाता रहा है. असिम उमर इसके पहले २०१३ में भारतीय मुसलमानों से कथित जिहाद में शामिल होने की अपील जारी कर चुका है. अगर आईएस के भारतीय कनेक्शन की बात करें तो खुफिया एजेंसियां बता ही चुकी हैं कि महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कुछ मुसलमान युवक आईएस की ओर से इराक और सीरिया में लड़ रहे हैं. यही नहीं, कुछ दिन पहले कश्मीर में भी आईएस के समर्थन में पर्चे बांटे जाने की जानकारी सामने आई थीं.
खुफिया एजेंसियां यह भी बता चुकी हैं कि केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर के कुछ संगठन आईएस और अल कायदा के संपर्क में हैं. ये संगठन लश्कर और अल कायदा के लिए भर्ती समेत स्लीपर सेल बनाने में जुटा है. इंडियन मुजाहिदीन के मोहम्मद अहमद जरार सिद्दीबप्पा उर्फ यासीन भटकल का अल कायदा कनेक्शन किसी से छिपा नहीं है. एनआईए से पूछताछ में यासीन भटकल अल कायदा के मंसूबों के बारे में बता चुका है. ऐसे में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जवाहिरी का टेप सामने आने के बाद यूपी समेत देश में हाई अलर्ट जारी कर अच्छा ही किया है. लेकिन, यह समय सिर्फ हाई अलर्ट जारी न कर कुछ और ठोस कदम उठाने का भी है. मुंबई ब्लास्ट के बाद आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अभी भी कई खामियां देखने में आती हैं. सबसे गंभीर तो यही कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जरूरी तालमेल का अभी भी अभाव है. जरूरी सूचनाएं एक-दूसरे को मिलने में विलंब होता है.
दूसरी गंभीर खामी है एनआईए, आईबी व रॉ समेत राज्य की खुफिया इकाइयों और फोर्स में खाली पड़े पद. उनके पास अत्याधुनिक उपकरण और हथियारों की कमी है. यह तब है जब आईएस और अल कायदा तो छोडि़ए स्थानीय अपराधी गिरोहों के पास भी काफी बेहतर हथियार हैं. इन मोर्चों पर भी तुरंत ध्यान देते हुए केंद्र समेत राज्य सरकारों को सकारात्मक कदम उठाने होंगे. साथ ही उन देशद्रोही तत्वों का भी ध्यान रखना होगा जो देश के भीतर सक्रिय रहते हुए आतंकी संगठनों को मदद पहुंचाते हैं. सरहदों की सुरक्षा खासकर पाकिस्तान और नेपाल से लगी सीमा पर चौकसी बढ़ानी होगी. पाकिस्तान अपनी सीमा के साथ-साथ नेपाल सीमा का इस्तेमाल भी आतंकी तत्वों की घुसपैठ कराने में करता है.
इसके साथ ही यह समय भारत की कूटनीतिक परीक्षा का भी है. अब जब स्थापित हो चुका है कि आतंकवाद और पाकिस्तान का चोली-दामन का साथ है, तो वैश्विक मंच पर इस नापाक गठबंधन को उठाने का कोई मौका नहीं छोडऩा होगा. साथ ही संयुक्त राष्ट्र के आतंकी संगठनों के वित्तीय स्रोतों पर लगाम लगाने के निर्णय को भी अमल में लाना होगा. इसके लिए सभी देशों की मिलकर प्रयास करना होगा. गौरतलब है कि सिर्फ सऊदी अरब और पाकिस्तान ही ने संयुक्त राष्ट्र के इस निर्णय पर गंभीरता से अमल नहीं किया है.
यहां आम भारतीय भी अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते. केंद्र या राज्य सरकारों की आतंक के खिलाफ लड़ाई तभी जीती जा सकेगी, जब आमजन भी देश से जुड़े अपने कर्तव्यों को समझते हुए अपने आसपास की घटनाओं पर नजर रख, समय रहते सूचनाएं प्रशासन को पहुंचाए. अगर हम इतना भर कर लेते हैं तो अल कायदा या आईएस समेत किसी से भी डर का भाव मात्र भी लाने की जरूरत हमें नहीं पड़ेगी.