Tuesday, February 7, 2012

My dog is like the Indian POLITICIAN!

PROPHETIC WORDS OF NANI PALKIWALA
Nani Palkhiwala wrote on 16 January 1984.

“The picture that emerges is that of a great country in a state of moral decay. The immediate future seems to belong to the doomsayers rather than to cheer mongers. We suffer from a fatty degeneration of conscience, and the malady seems to be not only persistent but prone to aggravation. The life style of too many politicians and businessmen bears eloquent testimony to the truth of dictum that the single minded pursuit of money impoverishes the mind, shrivels the imagination and desiccates the heart.
The tricolour fluttering all over the country is black, red and scarlet –
black money, red tape and scarlet corruption.”

My dog sleeps about 20 hours a day.

He has his food prepared for him.

He can eat whenever he wants, 24/7/365.

His meals are provided at no cost to him.

By the way he does not need to pay for medical insurance

He visits the doctor once a year for his checkup, and again

during the year if any medical needs arise.

For this he pays nothing, and nothing is required of him.

He lives in a nice neighborhood in a house that is much larger than he
needs,

but he is not required to do any upkeep. If he makes a mess, someone else
cleans it up.

He has his choice of luxurious places to sleep.

He receives these accommodations absolutely free.

He is living like a King, and has absolutely no expenses whatsoever.

All of his costs are picked up by others who go out and earn a living every
day. I was just thinking about all this, and suddenly it hit me like a brick
in the head.......

My dog is like the Indian POLITICIAN!

Wednesday, January 25, 2012

बेचारे पंकज पचौरी! सिर मुड़ाते ही ओले पड़े


मुझे अपने हमपेशा पंकज पचौरीजी की फिक्र हो रही है। उनके लिए यह सिर मुड़ाते ओले पडऩे वाली बात है। सलमान रुश्दी प्रकरण ने जिस तरह कांग्रेस नीत सरकार की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत कराई है, उसका डैमेज कंट्रोल भला वे कैसे कर सकेंगे? खासकर अगर इस बात में सच्चाई है कि उन्हें प्रधानमंत्री के भूतपूर्व मीडिया सलाहकार हरीश खरे के दौर में हुए 'डैमेजÓ को 'कंट्रोलÓ करने के लिए बतौर कम्युनिकेशन मैनेजर लाया गया है।
जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में सलमान रुश्दी भाग न ले सकें, इसकी जो 'स्क्रिप्टÓ लिखी गई, वह बुरी तरह से बैकफायर कर गई। आतंकी हमले की आशंका के बाद रुश्दी द्वारा जयपुर यात्रा टालने और फिर वीडियो कांफ्रेंसिंग की इजाजत न दिए जाने से स्पष्ट हो गया कि सारा खेल अल्पसंख्यकों को रिझाने या दूसरे शब्दों में कहें तो तुष्टिकरण की राजनीति का रहा।
इस पूरे प्रसंग ने मुझे एक बार फिर 1988 की याद दिला दी। जब एक उभरते लेखक ने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को द न्यूयॉर्क टाइम्स में एक खुला पत्र लिखा था। इस पत्र में उसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के स्वरूप को लेकर प्रश्न पूछे थे, जो आज फिर मौजूं हो गए हैं। जाहिर सी बात है कि वह युवा लेखक सलमान रुश्दी थे, जो अपनी किताब 'द सैटेनिक वर्सेसÓ पर प्रतिबंध लगाए जाने का औचित्य और आवश्यकता जानना चाह रहे थे।
इन प्रश्नों को उठाते वक्त रुश्दी ने स्पष्ट तौर पर लिखा था, 'किताब पर प्रतिबंध लगाने के बाद क्या भारत सभ्य लोकतंत्र होने का दावा कर सकेगा?Ó रुश्दी ने इस पत्र में स्पष्ट इशारा किया था कि सरकार या तो अक्षम है या फिर जानबूझ कर अतिवादी धार्मिक संगठनों के आगे झुक रही है। उन्होंने लिखा था, 'प्रतिबंध से जाहिर होता है कि अब कट्टरवादी ताकतें राजनीतिक एजेंडा तय कर रही है। आप जानते हैं, मैं जानता हूं कि शहाबुद्दीन, खुर्शीद आलम खां और उन जैसी सोच रखने वालों को मेरी किताब से कोई लेना-देना नहीं है। असल मसला मुस्लिम वोट है।Ó
देखिए इतिहास फिर से 2012 में अपने को दोहरा रहा है। इस बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति और उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को रिझाने के लिए यह वितंडा रचा गया। जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल से पहले रुश्दी की यात्रा को लेकर जयपुर के कुछ मजहबी संगठनों ने विरोध दर्ज कराया। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गेंद केंद्र के पाले में डाली कि रुश्दी को वीजा न दिया जाए। यह जाते हुए भी रुश्दी को भारत आने-जाने के लिए वीजा की दरकार ही नहीं है। जैसा अपेक्षित था केंद्र सरकार मूक दर्शक बनी रही। रुश्दी की यात्रा टलते न देख 'आतंकी हमलावरों को सुपारीÓ का स्वांग रचा गया, जो अंतत: कामयाब रहा। लेकिन इसकी पोल खुली और केंद्र व राजस्थान सरकार सलमान रुश्दी समेत भारतीय मीडिया के निशाने पर आ गई।
हम तो चुप रहेंगे की प्रवृत्ति ने इस बात को और हवा दी कि वास्तव में यह सारा खेल यूपी चुनाव को लेकर रचा गया। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति कितनी पुरानी है इसे मरहूम चित्रकार एमएफ हुसैन के एक बयान से भी समझा जा सकता है। उन्होंने भारतीय नागरिकता लौटाने की पेशकश की थी। उस वक्त वे दुबई में रह रहे थे। उन्हीं दिनों 'तहलकाÓ पत्रिका को दिए साक्षात्कार में हुसैन साहब ने यहां तक कह डाला था, 'अब भारत तभी आना हो सकता है, जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बने।Ó देश के बुद्धिजीवियों की जबरदस्त मांग के बावजूद मनमोहन सरकार हुसैन साहब की सुरक्षित स्वदेश वापसी सुनिश्चित नहीं करा सकी। क्या यह शर्मनाक नहीं है कि एक शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान एक अदद व्यक्ति की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सका?  यही बात राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को शर्मसार कर सकती है। उनकी सरकार एक व्यक्ति (सलमान रुश्दी पढ़ें) को सुरक्षा नहीं दे सकी? उलटे मुट्ठी भर कट्टरपंथियों के आगे झुक गई।
प्रतिबंध और कांग्रेस का इतिहास बहुत पुराना है। 1988 में कांग्रेस सरकार थी, जब द सैटेनिक वर्सेस पर प्रतिबंध लगा। वह भी बेहद अजीबो-गरीब तरीके से। जी हां, भारतीय वित्त मंत्रालय ने कस्टम एक्ट की धारा 11 के तहत किताब प्रतिबंधित की थी। यानी वित्त मंत्रालय ने तय किया था कि भारतीय कौन सी किताब पढ़ें और कौन सी नहीं? वही आज भी हुआ। पढ़े जाने की तुलना में असंख्य गुना ज्यादा बार जलाई गई यह किताब शायद ही फिलहाल विरोध करने वाले किसी शख्स ने पढ़ी हो। खैर, यह कांग्रेस ही थी जिसने महाराष्ट्र में जेम्स लेने की किताब 'द शिवाजीÓ प्रतिबंधित की। वह तो रोहिंटन मिस्त्री के साथ भी खड़ी नहीं हो सकी। और ताजा मामले में एके रामानुजम के निबंध को ही कोर्स से हटा दिया।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस की मजम्मत करने के नाम पर मैं अन्य राजनीतिक पार्टियों के ऐसे ही अलोकतांत्रिक कदमों की पैरवी कर रहा हूं। मोटे तौर पर बात करें तो बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की मुखालफत करने वाले वामपंथी तो डीएन झा की किताब प्रतिबंधित करने वाली भाजपा भी ऐसी ही प्रताडऩा की अधिकारी है। भाजपा ने भी आमिर खान की फिल्म 'फना,Ó तो हबीब तनवीर के नाटक और दीपा मेहता की फिल्म 'फायरÓ को लेकर कम हायतौबा नहीं मचाई। यहां तक कि अपनी ही पार्टी के कद्दावर नेता जसवंत सिंह को जिन्ना पर लिखी किताब के कारण बाहर का रास्ता दिखा दिया।
रुश्दी के हालिया मामले में एक मोड़ ऐसा भी आया जब उनके जयपुर न आने के विरोध स्वरूप जेएलएफ में चार लेखकों ने द सैटेनिक वर्सेस के अंश पढ़ दिए। इसके एवज में उन्हें न सिर्फ वहां से भागना पड़ा, बल्कि देश के कई हिस्सों में उनके खिलाफ मुकदमें भी दर्ज हो गए। यहां भी कांग्रेस शांत है, जबकि उसके पास एक से बढ़कर एक दिग्गज कानूनदां हैं, जो इस पूरी कवायद को सिरे से खारिज कर सकते हैं। कस्टम एक्ट की जिस धारा के तहत किताब प्रतिबंधित की गई है, वह सिर्फ उसके आयात को रोकती है। यानी प्रतिबंधित होने से पहले यदि वह किताब किसी के पास थी, तो उस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। यह बात उसके अंश पढऩे पर भी लागू होती है। कस्टम एक्ट के तहत मौजूद किताब के अंश पढऩा प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं है। आप सिर्फ किताब देश के बाहर से नहीं ला सकते हैं।
अब ऐसी स्थिति में पंकज पचौरी को लेकर मेरी चिंता आप समझ सकते हैं। उनके लिए इस 'डैमेजÓ को कंट्रोल करना कितना मुश्किल होगा। देश के मीडिया को तो वे एक बार समझा भी सकते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया का क्या, जो आज रुश्दी प्रकरण को ही प्रमुखता से उठाने से नहीं चूका है।

उपसंहार
दिल बहलाने के लिए गालिब यह ख्याल अच्छा है कि तर्ज पर तुष्टिकरण की राजनीति सिर्फ हमारे यहां ही नहीं होती है। ऐसी दानिशदिली और देशों में भी देखने को आती है। ताजा मसला एरिजोना से जुड़ा है। वहां टक्सन इलाके के शिक्षा ठेकेदारों ने शेक्सपियर की अमर कृति 'टेंपेस्टÓ को प्रतिबंधित कर दिया है। आरोप है वह नस्लवाद और सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देती है।

Tuesday, January 10, 2012

इजरायल, चीन और हम

पहले प्रकरण की शुरुआत करते हैं इजरायल से। अरब देशों से फ्रांस की नजदीकी के चलते इजरायल से उसके संबंध हमेशा जटिल रहे हैं। यह अलग बात है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने नए सिरे से कोशिश करते हुए एक समय इजरायल को फ्रांस का दोस्त करार दिया। और, वही सरकोजी जी20 सम्मेलन के दौरान चालू माइक के आगे इजरायल के राष्ट्राध्यक्ष बेंजामिन नेतान्यहू को 'झूठा नंबर वनÓ तक कह गए। लेकिन दोनों देशों के संंबंधों में हालिया कड़वाहट का केंद्र बनी है पिछले साल सितंबर में तेल अवीव में हुई एक कार दुर्घटना। इस दुर्घटना में मरने वाली 25 वर्षीय युवती ली जितोनी इजरायली नागरिक थी और कार पर सवार दोनों नागरिक फ्रांसीसी थे। क्लॉड इजाक और एरिक रूबिक दुर्घटना होते ही न सिर्फ घटनास्थल से भागने में सफल रहे, बल्कि पहली ही फ्लाइट पकड़ वापस फ्रांस लौट आए। पुलिसिया जांच में जब कार के नंबर से सूत्र तलाशती इजरायली पुलिस होटल पहुंची तो पता चला कि दोषी फरार हो चुके हैं। इसके बाद इजरायल सरकार ने फ्रांस से दोनों दोषियों के प्रत्यर्पण का निवेदन किया। जाहिर सी बात है कि फ्रांस ने अपने प्रत्यर्पण कानून का हवाला देते हुए ऐसा करने से इंकार कर दिया। 2004 में पारित कानून के तहत फ्रांस अपने किसी भी नागरिक को, यूरोपीय संघ को छोड़, किसी अन्य देश को प्रत्यर्पित नहीं करेगा। फ्रांस के इंकार पर इजरायल में प्रदर्शन शुरू हो गए। यहां तक कि 29 दिसंबर को फ्रांस के एक गायक पैट्रिक ब्रूल को तेल अवीव की यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम प्रस्तुत नहीं करने दिया गया। यही नहीं इजराइल ने अपने
गठन के बाद नाज़ी जनरलों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारा था. हम जानते है कि दाउद कराची
मैं है लेकिन हम क्या कर सके हैं?   दूसरा प्रकरण: 10 जनवरी को एक पंद्रह सदस्यीय भारतीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल चीन रवाना हुआ है। पहले इसमें 30 सदस्य जाने वाले थे, लेकिन बीजिंग प्रशासन द्वारा अरुणाचल प्रदेश में तैनात एक वायुसेना अधिकारी को वीजा जारी न करने पर संख्या में कटौती की गई। बताते हैं कि पहले तो चीन द्वारा वीजा न देेने पर दौरा ही रद्द किया जा रहा था। लेकिन किन्हीं 'राजनीतिक विद्वानÓ ने ऐसा न करने की सलाह दी। उनका कहना था कि सीमा विवाद पुराना मसला है। ऐसे में अरुणाचल प्रदेश में तैनात अधिकारी को प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं करना चाहिए था। जब चीन से वार्तालाप बढ़ रहा है तो दौरा रद्द करने के बजाए प्रतिनिधिमंडल को छोटा करके भेजने में अक्लमंदी है। यह तब है जब यिवू में भारतीय राजनयिक से हुए दुव्र्यवहार की जलन अभी शांत नहीं हुई है। यह वही चीन है जो अपने हितों की खातिर अमेरिका को आंख दिखाने से नहीं चूकता। लेकिन हमारे राजनेता आखिर किस 'हितÓ के कारण बगैर रीढ़ के हो रहे हैं।
 अब सवाल यह उठता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को आखिर क्या चीज 'बेइज्जतीÓ सहने को मजबूर कर देती है, जबकि इजरायल जैसा देश अपने एक नागरिक की मौत को अपनी अस्मिता का प्रश्न बना कर फ्रांस जैसे राष्ट्र को आंखें तरेरने में गुरेज नहीं करता। इजरायल जैसे देश की विदेश नीति उसके नागरिकों के अधिकारों से नियंत्रित होती है, जबकि भारत के पास संभवत: विदेश नीति के कोई ठोस नियम या कायदे नहीं हैं। यह बात इसलिए कहना पड़ रही है कि क्योंकि भारतीय विदेश मंत्री इन दिनों इजरायल के दौरे पर हैं। उनके इस दौरे को जानबूझ कर केंद्र सरकार द्वारा 'लोप्रोफाइलÓ रखा गया है। जानकर आश्चर्य होगा कि सिर्फ इसलिए कि कहीं इससे उसके 'वोट बैंकÓ पर असर न पड़े। जी हां, केंद्र सरकार को डर है कि एक यहूदी देश के दौरे पर उसके विदेश मंत्री के जाने से भारतीय मुस्लिम खासकर शिया समुदाय नाराज हो जाएगा और आसन्न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वह यह 'जोखिमÓ उठाने को तैयार नहीं है। यह जानकर इसलिए और दुख होता है कि एक समय भारत को सैन्य तकनीक और सहायता देने वाला 'निकट मित्रÓ रूस अब इस मामले में पिछड़ रहा है। उसका स्थान इजरायल ने ले लिया है। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि 'वोट बैंकÓ की राजनीति हमें कहां तक ले जा सकती है!
अब एक बार फिर जिक्र करते हैं इजरायल की सरकार और उसके नागरिकों द्वारा अपने नागरिक की मौत पर फ्रांस के खिलाफ किए जा रहे प्रदर्शन का। भारत का इस घटनाक्रम से गहरा वास्ता है। कैसे? बताते हैं। एस.एम. कृष्णा जिस वक्त इजरायल दौरे पर हैं उससे कुछ समय पहले ही इजरायल के विदेश मंत्री इहुद बराक ने सीएनएन चैनल को दिए इंटरव्यू में अगले छह माह में ईरान पर परमाणु हमले की संभावना से इंकार नहीं किया है। केंद्र सरकार शायद यह भूल रही है कि अगर ऐसा होता है तो सबसे पहले खाड़ी देशों में रह रहे उसके 60 लाख अप्रवासी भारतीयों पर इसका असर पड़ेगा। यही नहीं, परमाणु विकिरण भारतीय उपमहाद्वीप को भी अपनी चपेट में लेगा। इसके बावजूद एस.एम.कृष्णा की इजरायल यात्रा को 'लो प्रोफाइलÓ रखा गया। यानी जहां इजरायल अपने एक नागरिक के मारे जाने पर फ्रांस की नाक में दम कर सकता है, वहीं हमें अपने 60 लाख नागरिकों की बिल्कुल फिक्र नहीं है।
 यही जिक्र है...जिसे करना जरूरी लगा।इजरायल, चीन और हम

Monday, January 9, 2012

Today morning a feeling of hopelessness and guilt surrounded me. But, by the evening I still wandering the reason for the same.