जिक्र कहां से शुरू होता है, क्यों होता है और किसके द्वारा होता है, यह बताना शायद आसान नहीं है। हां,अगर बात में दम है तो जिक्र होगा। बात में दम कैसे आता है, क्यों आता है, यह बताना भी आसान नहीं। अगर पुरजोर गंभीर लहजे में बात की जाए, तो दम आ जाता है। अब पुरजोर लहजे में गंभीर बात का पैमाना भी तय करना आसान नहीं है। ब्लाग लिखना वह भी इस उम्मीद के साथ कि उसका जिक्र होगा ही शायद मुट्ठी बंद कर रेत को थामने जैसा ही है। लेकिन फिर भी जिक्र करने की हिमाकत करना शुरू कर रहा हूं।
Monday, January 9, 2012
Today morning a feeling of hopelessness and guilt surrounded me. But, by the evening I still wandering the reason for the same.
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