Wednesday, January 25, 2012

बेचारे पंकज पचौरी! सिर मुड़ाते ही ओले पड़े


मुझे अपने हमपेशा पंकज पचौरीजी की फिक्र हो रही है। उनके लिए यह सिर मुड़ाते ओले पडऩे वाली बात है। सलमान रुश्दी प्रकरण ने जिस तरह कांग्रेस नीत सरकार की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत कराई है, उसका डैमेज कंट्रोल भला वे कैसे कर सकेंगे? खासकर अगर इस बात में सच्चाई है कि उन्हें प्रधानमंत्री के भूतपूर्व मीडिया सलाहकार हरीश खरे के दौर में हुए 'डैमेजÓ को 'कंट्रोलÓ करने के लिए बतौर कम्युनिकेशन मैनेजर लाया गया है।
जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में सलमान रुश्दी भाग न ले सकें, इसकी जो 'स्क्रिप्टÓ लिखी गई, वह बुरी तरह से बैकफायर कर गई। आतंकी हमले की आशंका के बाद रुश्दी द्वारा जयपुर यात्रा टालने और फिर वीडियो कांफ्रेंसिंग की इजाजत न दिए जाने से स्पष्ट हो गया कि सारा खेल अल्पसंख्यकों को रिझाने या दूसरे शब्दों में कहें तो तुष्टिकरण की राजनीति का रहा।
इस पूरे प्रसंग ने मुझे एक बार फिर 1988 की याद दिला दी। जब एक उभरते लेखक ने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को द न्यूयॉर्क टाइम्स में एक खुला पत्र लिखा था। इस पत्र में उसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के स्वरूप को लेकर प्रश्न पूछे थे, जो आज फिर मौजूं हो गए हैं। जाहिर सी बात है कि वह युवा लेखक सलमान रुश्दी थे, जो अपनी किताब 'द सैटेनिक वर्सेसÓ पर प्रतिबंध लगाए जाने का औचित्य और आवश्यकता जानना चाह रहे थे।
इन प्रश्नों को उठाते वक्त रुश्दी ने स्पष्ट तौर पर लिखा था, 'किताब पर प्रतिबंध लगाने के बाद क्या भारत सभ्य लोकतंत्र होने का दावा कर सकेगा?Ó रुश्दी ने इस पत्र में स्पष्ट इशारा किया था कि सरकार या तो अक्षम है या फिर जानबूझ कर अतिवादी धार्मिक संगठनों के आगे झुक रही है। उन्होंने लिखा था, 'प्रतिबंध से जाहिर होता है कि अब कट्टरवादी ताकतें राजनीतिक एजेंडा तय कर रही है। आप जानते हैं, मैं जानता हूं कि शहाबुद्दीन, खुर्शीद आलम खां और उन जैसी सोच रखने वालों को मेरी किताब से कोई लेना-देना नहीं है। असल मसला मुस्लिम वोट है।Ó
देखिए इतिहास फिर से 2012 में अपने को दोहरा रहा है। इस बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति और उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को रिझाने के लिए यह वितंडा रचा गया। जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल से पहले रुश्दी की यात्रा को लेकर जयपुर के कुछ मजहबी संगठनों ने विरोध दर्ज कराया। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गेंद केंद्र के पाले में डाली कि रुश्दी को वीजा न दिया जाए। यह जाते हुए भी रुश्दी को भारत आने-जाने के लिए वीजा की दरकार ही नहीं है। जैसा अपेक्षित था केंद्र सरकार मूक दर्शक बनी रही। रुश्दी की यात्रा टलते न देख 'आतंकी हमलावरों को सुपारीÓ का स्वांग रचा गया, जो अंतत: कामयाब रहा। लेकिन इसकी पोल खुली और केंद्र व राजस्थान सरकार सलमान रुश्दी समेत भारतीय मीडिया के निशाने पर आ गई।
हम तो चुप रहेंगे की प्रवृत्ति ने इस बात को और हवा दी कि वास्तव में यह सारा खेल यूपी चुनाव को लेकर रचा गया। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति कितनी पुरानी है इसे मरहूम चित्रकार एमएफ हुसैन के एक बयान से भी समझा जा सकता है। उन्होंने भारतीय नागरिकता लौटाने की पेशकश की थी। उस वक्त वे दुबई में रह रहे थे। उन्हीं दिनों 'तहलकाÓ पत्रिका को दिए साक्षात्कार में हुसैन साहब ने यहां तक कह डाला था, 'अब भारत तभी आना हो सकता है, जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बने।Ó देश के बुद्धिजीवियों की जबरदस्त मांग के बावजूद मनमोहन सरकार हुसैन साहब की सुरक्षित स्वदेश वापसी सुनिश्चित नहीं करा सकी। क्या यह शर्मनाक नहीं है कि एक शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान एक अदद व्यक्ति की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सका?  यही बात राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को शर्मसार कर सकती है। उनकी सरकार एक व्यक्ति (सलमान रुश्दी पढ़ें) को सुरक्षा नहीं दे सकी? उलटे मुट्ठी भर कट्टरपंथियों के आगे झुक गई।
प्रतिबंध और कांग्रेस का इतिहास बहुत पुराना है। 1988 में कांग्रेस सरकार थी, जब द सैटेनिक वर्सेस पर प्रतिबंध लगा। वह भी बेहद अजीबो-गरीब तरीके से। जी हां, भारतीय वित्त मंत्रालय ने कस्टम एक्ट की धारा 11 के तहत किताब प्रतिबंधित की थी। यानी वित्त मंत्रालय ने तय किया था कि भारतीय कौन सी किताब पढ़ें और कौन सी नहीं? वही आज भी हुआ। पढ़े जाने की तुलना में असंख्य गुना ज्यादा बार जलाई गई यह किताब शायद ही फिलहाल विरोध करने वाले किसी शख्स ने पढ़ी हो। खैर, यह कांग्रेस ही थी जिसने महाराष्ट्र में जेम्स लेने की किताब 'द शिवाजीÓ प्रतिबंधित की। वह तो रोहिंटन मिस्त्री के साथ भी खड़ी नहीं हो सकी। और ताजा मामले में एके रामानुजम के निबंध को ही कोर्स से हटा दिया।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस की मजम्मत करने के नाम पर मैं अन्य राजनीतिक पार्टियों के ऐसे ही अलोकतांत्रिक कदमों की पैरवी कर रहा हूं। मोटे तौर पर बात करें तो बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की मुखालफत करने वाले वामपंथी तो डीएन झा की किताब प्रतिबंधित करने वाली भाजपा भी ऐसी ही प्रताडऩा की अधिकारी है। भाजपा ने भी आमिर खान की फिल्म 'फना,Ó तो हबीब तनवीर के नाटक और दीपा मेहता की फिल्म 'फायरÓ को लेकर कम हायतौबा नहीं मचाई। यहां तक कि अपनी ही पार्टी के कद्दावर नेता जसवंत सिंह को जिन्ना पर लिखी किताब के कारण बाहर का रास्ता दिखा दिया।
रुश्दी के हालिया मामले में एक मोड़ ऐसा भी आया जब उनके जयपुर न आने के विरोध स्वरूप जेएलएफ में चार लेखकों ने द सैटेनिक वर्सेस के अंश पढ़ दिए। इसके एवज में उन्हें न सिर्फ वहां से भागना पड़ा, बल्कि देश के कई हिस्सों में उनके खिलाफ मुकदमें भी दर्ज हो गए। यहां भी कांग्रेस शांत है, जबकि उसके पास एक से बढ़कर एक दिग्गज कानूनदां हैं, जो इस पूरी कवायद को सिरे से खारिज कर सकते हैं। कस्टम एक्ट की जिस धारा के तहत किताब प्रतिबंधित की गई है, वह सिर्फ उसके आयात को रोकती है। यानी प्रतिबंधित होने से पहले यदि वह किताब किसी के पास थी, तो उस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। यह बात उसके अंश पढऩे पर भी लागू होती है। कस्टम एक्ट के तहत मौजूद किताब के अंश पढऩा प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं है। आप सिर्फ किताब देश के बाहर से नहीं ला सकते हैं।
अब ऐसी स्थिति में पंकज पचौरी को लेकर मेरी चिंता आप समझ सकते हैं। उनके लिए इस 'डैमेजÓ को कंट्रोल करना कितना मुश्किल होगा। देश के मीडिया को तो वे एक बार समझा भी सकते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया का क्या, जो आज रुश्दी प्रकरण को ही प्रमुखता से उठाने से नहीं चूका है।

उपसंहार
दिल बहलाने के लिए गालिब यह ख्याल अच्छा है कि तर्ज पर तुष्टिकरण की राजनीति सिर्फ हमारे यहां ही नहीं होती है। ऐसी दानिशदिली और देशों में भी देखने को आती है। ताजा मसला एरिजोना से जुड़ा है। वहां टक्सन इलाके के शिक्षा ठेकेदारों ने शेक्सपियर की अमर कृति 'टेंपेस्टÓ को प्रतिबंधित कर दिया है। आरोप है वह नस्लवाद और सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देती है।

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