पहले प्रकरण की शुरुआत करते हैं इजरायल से। अरब देशों से फ्रांस की नजदीकी के चलते इजरायल से उसके संबंध हमेशा जटिल रहे हैं। यह अलग बात है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने नए सिरे से कोशिश करते हुए एक समय इजरायल को फ्रांस का दोस्त करार दिया। और, वही सरकोजी जी20 सम्मेलन के दौरान चालू माइक के आगे इजरायल के राष्ट्राध्यक्ष बेंजामिन नेतान्यहू को 'झूठा नंबर वनÓ तक कह गए। लेकिन दोनों देशों के संंबंधों में हालिया कड़वाहट का केंद्र बनी है पिछले साल सितंबर में तेल अवीव में हुई एक कार दुर्घटना। इस दुर्घटना में मरने वाली 25 वर्षीय युवती ली जितोनी इजरायली नागरिक थी और कार पर सवार दोनों नागरिक फ्रांसीसी थे। क्लॉड इजाक और एरिक रूबिक दुर्घटना होते ही न सिर्फ घटनास्थल से भागने में सफल रहे, बल्कि पहली ही फ्लाइट पकड़ वापस फ्रांस लौट आए। पुलिसिया जांच में जब कार के नंबर से सूत्र तलाशती इजरायली पुलिस होटल पहुंची तो पता चला कि दोषी फरार हो चुके हैं। इसके बाद इजरायल सरकार ने फ्रांस से दोनों दोषियों के प्रत्यर्पण का निवेदन किया। जाहिर सी बात है कि फ्रांस ने अपने प्रत्यर्पण कानून का हवाला देते हुए ऐसा करने से इंकार कर दिया। 2004 में पारित कानून के तहत फ्रांस अपने किसी भी नागरिक को, यूरोपीय संघ को छोड़, किसी अन्य देश को प्रत्यर्पित नहीं करेगा। फ्रांस के इंकार पर इजरायल में प्रदर्शन शुरू हो गए। यहां तक कि 29 दिसंबर को फ्रांस के एक गायक पैट्रिक ब्रूल को तेल अवीव की यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम प्रस्तुत नहीं करने दिया गया। यही नहीं इजराइल ने अपने
गठन के बाद नाज़ी जनरलों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारा था. हम जानते है कि दाउद कराची
मैं है लेकिन हम क्या कर सके हैं? दूसरा प्रकरण: 10 जनवरी को एक पंद्रह सदस्यीय भारतीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल चीन रवाना हुआ है। पहले इसमें 30 सदस्य जाने वाले थे, लेकिन बीजिंग प्रशासन द्वारा अरुणाचल प्रदेश में तैनात एक वायुसेना अधिकारी को वीजा जारी न करने पर संख्या में कटौती की गई। बताते हैं कि पहले तो चीन द्वारा वीजा न देेने पर दौरा ही रद्द किया जा रहा था। लेकिन किन्हीं 'राजनीतिक विद्वानÓ ने ऐसा न करने की सलाह दी। उनका कहना था कि सीमा विवाद पुराना मसला है। ऐसे में अरुणाचल प्रदेश में तैनात अधिकारी को प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं करना चाहिए था। जब चीन से वार्तालाप बढ़ रहा है तो दौरा रद्द करने के बजाए प्रतिनिधिमंडल को छोटा करके भेजने में अक्लमंदी है। यह तब है जब यिवू में भारतीय राजनयिक से हुए दुव्र्यवहार की जलन अभी शांत नहीं हुई है। यह वही चीन है जो अपने हितों की खातिर अमेरिका को आंख दिखाने से नहीं चूकता। लेकिन हमारे राजनेता आखिर किस 'हितÓ के कारण बगैर रीढ़ के हो रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को आखिर क्या चीज 'बेइज्जतीÓ सहने को मजबूर कर देती है, जबकि इजरायल जैसा देश अपने एक नागरिक की मौत को अपनी अस्मिता का प्रश्न बना कर फ्रांस जैसे राष्ट्र को आंखें तरेरने में गुरेज नहीं करता। इजरायल जैसे देश की विदेश नीति उसके नागरिकों के अधिकारों से नियंत्रित होती है, जबकि भारत के पास संभवत: विदेश नीति के कोई ठोस नियम या कायदे नहीं हैं। यह बात इसलिए कहना पड़ रही है कि क्योंकि भारतीय विदेश मंत्री इन दिनों इजरायल के दौरे पर हैं। उनके इस दौरे को जानबूझ कर केंद्र सरकार द्वारा 'लोप्रोफाइलÓ रखा गया है। जानकर आश्चर्य होगा कि सिर्फ इसलिए कि कहीं इससे उसके 'वोट बैंकÓ पर असर न पड़े। जी हां, केंद्र सरकार को डर है कि एक यहूदी देश के दौरे पर उसके विदेश मंत्री के जाने से भारतीय मुस्लिम खासकर शिया समुदाय नाराज हो जाएगा और आसन्न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वह यह 'जोखिमÓ उठाने को तैयार नहीं है। यह जानकर इसलिए और दुख होता है कि एक समय भारत को सैन्य तकनीक और सहायता देने वाला 'निकट मित्रÓ रूस अब इस मामले में पिछड़ रहा है। उसका स्थान इजरायल ने ले लिया है। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि 'वोट बैंकÓ की राजनीति हमें कहां तक ले जा सकती है!
अब एक बार फिर जिक्र करते हैं इजरायल की सरकार और उसके नागरिकों द्वारा अपने नागरिक की मौत पर फ्रांस के खिलाफ किए जा रहे प्रदर्शन का। भारत का इस घटनाक्रम से गहरा वास्ता है। कैसे? बताते हैं। एस.एम. कृष्णा जिस वक्त इजरायल दौरे पर हैं उससे कुछ समय पहले ही इजरायल के विदेश मंत्री इहुद बराक ने सीएनएन चैनल को दिए इंटरव्यू में अगले छह माह में ईरान पर परमाणु हमले की संभावना से इंकार नहीं किया है। केंद्र सरकार शायद यह भूल रही है कि अगर ऐसा होता है तो सबसे पहले खाड़ी देशों में रह रहे उसके 60 लाख अप्रवासी भारतीयों पर इसका असर पड़ेगा। यही नहीं, परमाणु विकिरण भारतीय उपमहाद्वीप को भी अपनी चपेट में लेगा। इसके बावजूद एस.एम.कृष्णा की इजरायल यात्रा को 'लो प्रोफाइलÓ रखा गया। यानी जहां इजरायल अपने एक नागरिक के मारे जाने पर फ्रांस की नाक में दम कर सकता है, वहीं हमें अपने 60 लाख नागरिकों की बिल्कुल फिक्र नहीं है।
यही जिक्र है...जिसे करना जरूरी लगा।इजरायल, चीन और हम
गठन के बाद नाज़ी जनरलों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारा था. हम जानते है कि दाउद कराची
मैं है लेकिन हम क्या कर सके हैं? दूसरा प्रकरण: 10 जनवरी को एक पंद्रह सदस्यीय भारतीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल चीन रवाना हुआ है। पहले इसमें 30 सदस्य जाने वाले थे, लेकिन बीजिंग प्रशासन द्वारा अरुणाचल प्रदेश में तैनात एक वायुसेना अधिकारी को वीजा जारी न करने पर संख्या में कटौती की गई। बताते हैं कि पहले तो चीन द्वारा वीजा न देेने पर दौरा ही रद्द किया जा रहा था। लेकिन किन्हीं 'राजनीतिक विद्वानÓ ने ऐसा न करने की सलाह दी। उनका कहना था कि सीमा विवाद पुराना मसला है। ऐसे में अरुणाचल प्रदेश में तैनात अधिकारी को प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं करना चाहिए था। जब चीन से वार्तालाप बढ़ रहा है तो दौरा रद्द करने के बजाए प्रतिनिधिमंडल को छोटा करके भेजने में अक्लमंदी है। यह तब है जब यिवू में भारतीय राजनयिक से हुए दुव्र्यवहार की जलन अभी शांत नहीं हुई है। यह वही चीन है जो अपने हितों की खातिर अमेरिका को आंख दिखाने से नहीं चूकता। लेकिन हमारे राजनेता आखिर किस 'हितÓ के कारण बगैर रीढ़ के हो रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को आखिर क्या चीज 'बेइज्जतीÓ सहने को मजबूर कर देती है, जबकि इजरायल जैसा देश अपने एक नागरिक की मौत को अपनी अस्मिता का प्रश्न बना कर फ्रांस जैसे राष्ट्र को आंखें तरेरने में गुरेज नहीं करता। इजरायल जैसे देश की विदेश नीति उसके नागरिकों के अधिकारों से नियंत्रित होती है, जबकि भारत के पास संभवत: विदेश नीति के कोई ठोस नियम या कायदे नहीं हैं। यह बात इसलिए कहना पड़ रही है कि क्योंकि भारतीय विदेश मंत्री इन दिनों इजरायल के दौरे पर हैं। उनके इस दौरे को जानबूझ कर केंद्र सरकार द्वारा 'लोप्रोफाइलÓ रखा गया है। जानकर आश्चर्य होगा कि सिर्फ इसलिए कि कहीं इससे उसके 'वोट बैंकÓ पर असर न पड़े। जी हां, केंद्र सरकार को डर है कि एक यहूदी देश के दौरे पर उसके विदेश मंत्री के जाने से भारतीय मुस्लिम खासकर शिया समुदाय नाराज हो जाएगा और आसन्न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वह यह 'जोखिमÓ उठाने को तैयार नहीं है। यह जानकर इसलिए और दुख होता है कि एक समय भारत को सैन्य तकनीक और सहायता देने वाला 'निकट मित्रÓ रूस अब इस मामले में पिछड़ रहा है। उसका स्थान इजरायल ने ले लिया है। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि 'वोट बैंकÓ की राजनीति हमें कहां तक ले जा सकती है!
अब एक बार फिर जिक्र करते हैं इजरायल की सरकार और उसके नागरिकों द्वारा अपने नागरिक की मौत पर फ्रांस के खिलाफ किए जा रहे प्रदर्शन का। भारत का इस घटनाक्रम से गहरा वास्ता है। कैसे? बताते हैं। एस.एम. कृष्णा जिस वक्त इजरायल दौरे पर हैं उससे कुछ समय पहले ही इजरायल के विदेश मंत्री इहुद बराक ने सीएनएन चैनल को दिए इंटरव्यू में अगले छह माह में ईरान पर परमाणु हमले की संभावना से इंकार नहीं किया है। केंद्र सरकार शायद यह भूल रही है कि अगर ऐसा होता है तो सबसे पहले खाड़ी देशों में रह रहे उसके 60 लाख अप्रवासी भारतीयों पर इसका असर पड़ेगा। यही नहीं, परमाणु विकिरण भारतीय उपमहाद्वीप को भी अपनी चपेट में लेगा। इसके बावजूद एस.एम.कृष्णा की इजरायल यात्रा को 'लो प्रोफाइलÓ रखा गया। यानी जहां इजरायल अपने एक नागरिक के मारे जाने पर फ्रांस की नाक में दम कर सकता है, वहीं हमें अपने 60 लाख नागरिकों की बिल्कुल फिक्र नहीं है।
यही जिक्र है...जिसे करना जरूरी लगा।इजरायल, चीन और हम
सही कहा निहार जी। हमारे देश का न तो कोई एक धर्म है, न शर्म और न ही कोई राष्ट्रभक्ति। कांग्रेस आज भी नेहरू के जमाने के पंचशील आधारित विदेश नीति को अपना रही है। इस बीच गंगा में काफी पानी बह गया, प्रदूषित भी हो गया, पर उसे ही हम पीने पर मजबूर हैं। हमें सोचना होगा कि हमारे पास ऐसा क्या है, जो हमारी ताकत है। जवाब मिलेगा 120 करोड़ लोगों की संख्या और 45 अरब युवाओं के बाजुओं की ताकत। हैरानी की बात यह है कि न तो राजनेता इसे पहचान रहे हैं और न ही लोग इसे अपने स्वाभिमान का प्रतीक मानकर चल रहे हैं। हिंदू और राम जैसे नारों के पीछे राजनीतिक मकसद किसी से छिपा नहीं है। बेहतर होगा कि देश अपनी इस ताकत को पहचाने और लोग भी अपने ही वतन को ताबह करने के बजाय इसके लिए मरना सीखें। हमारे लिए इस मामले में सबसे अच्छा सबक इजरायल ही है, जिसके तीन ओर समंदर है और एक छोर पर अरब देशों की सेना दुश्मनों की तरह खड़ी है। उनके सामने देश के लिए मर मिटने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं। यही उनकी ताकत है और यही हमारा सबक भी।
ReplyDelete