Wednesday, February 23, 2011

जिक्र का मकसद

जिक्र कहां से शुरू होता है, क्यों होता है और किसके द्वारा होता है, यह बताना शायद आसान नहीं है। हां, इतना तय है कि अगर बात में दम है तो उसका जिक्र होगा ही। बात में दम कैसे आता है, क्यों आता है, यह बताना भी आसान नहीं। इतना जरूर है कि अगर पुरजोर गंभीर लहजे में बात की जाए, तो दम बात में आ ही जाता है। अब पुरजोर लहजे में गंभीर बात कैसे की जाती है, यह पैमाना भी तय करना आसान नहीं है। इतना कह सकता हूं कि जो सोचा जाए उसे उसी तरह पेश करने से शायद गंभीरता आती है। ब्लाग लिखना वह भी इस उम्मीद के साथ कि उसका जिक्र होगा ही शायद मुट्ठी बंद कर रेत को थामने जैसा ही है। लेकिन फिर भी जिक्र करने की हिमाकत करना शुरू कर रहा हूं। इसकी प्रेरणा मेरे मित्र सौमित्र ने दी। फिलहाल जिक्र का मकसद तय कर रहा हूं। पेश-ए-खिदमत है एक शेर- सपनों ने अगर पंख लगाए नहीं होते, हम आज इस मकाम पर आए नहीं होते। जोने दो हमें धूप में, हवा में रहने दो, पेड़ों के लिए पेड़ के साए नहीं होते। जल्द ही बांग्लादेश द्वारा क्रिकेट विश्वकप की सह मेजबानी के निहितार्थ और बीमारू राज्य की स्वस्थ पहल के जिक्र के साथ पेश होऊंगा। तब तक के लिए बस इतना ही...

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