Monday, November 20, 2017

देश को सात प्रधानमंत्री देने वाली कांग्रेस के 133 सालों के इतिहास में 42 साल रहा गांधी परिवार का पार्टी अध्यक्ष

राहुल गांधी की बतौर पार्टी अध्यक्ष ताजपोशी की महज औपचारिकता ही बाकी है। इस तरह वह इस विरासत को संभालने वाले गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी के सदस्य होंगे। कांग्रेस की स्थापना के 133 सालों के इतिहास में कुल 42 साल तक पार्टी अध्यक्ष पद पर गांधी परिवार के ही किसी न किसी सदस्य कब्जा रहा है।
भूतपूवर् प्रधानमंत्री राजीव गांधी की असामयिक मौत के बाद 'कभी हां-कभी ना' वाला रवैया अख्तियार करने वाली सोनिया गांधी ने तो अध्यक्ष पद पर बने रहने के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। 1998 में पार्टी अध्यक्ष संभालने के बाद से सोनिया ही इस पर काबिज रहीं। एक समय था जब पार्टी अध्यक्ष के लिए हर साल चुनाव होते थे, लेकिन देश-काल-परिस्थितयों में आए बदलाव से यह परंपरा भी बदल गई। फिलहाल तो कांग्रेस यानी गांधी परिवार हो गया है।

गांधी परिवार से कांग्रेस अध्यक्ष

गौरतलब है कि 1885 में एओ ह्यूम ने कांग्रेस पार्टी की नींव रखी थी। उस समय व्योमेश चंद्र बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष चुना गया था। गांधी परिवार की ओर से पहली बार यह पद मोतीलाल नेहरू ने 1919 में संभाला था। वह 1928 में भी पार्टी अध्यक्ष चुने गए। हालांकि महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 के बाद कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन की पर्याय बन गई। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के डेढ़ करोड़ सदस्य थे, जबकि कार्यकर्ताओं की संख्या सात करोड़ के आसपास थी।
खैर, मोतीलाल जी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1936 और 1937 में आजादी के पहले पार्टी अध्यक्ष पद संभाला था। आजादी के बाद पंडित नेहरू 1951 में एक बार फिर पार्टी अध्यक्ष बने और 54 तक रहे। उनकी मौत के बाद इंदिरा गांधी ने 1959 में पार्टी अध्यक्ष संभाला। इसके बाद वह 1978 से 1984 तक इस पद को सुशभित करती रहीं।
इंदिरा गांधी की मौत के बाद एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री बने राजीन गांधी को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई। उन्होंने भी अपनी असामयिक मौत तक यानी 1991 तक प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष की दोहरी जिम्मेदारी निभाई। राजीव गांधी की मौत के बाद कांग्रेस को गांधी का पर्याय मानने वाले सोनिया गांधी से सक्रिय राजनीति में उतरने का बारंबार आग्रह करते रहे, लेकिन सोनिया ने ऐसी कोई सक्रियता नहीं दिखाई। हालांकि जबर्दस्त दबाव के बीच उन्होंने 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाल ही लिया। तब से लेकर अभी तक वह लगातार इस पद को सुशोभित करती आ रही हैं। उनके बाद भी अब यह जिम्मेदारी गांधी परिवार के ही राहुल गांधी संभालेंगे। कब तक, इस सवाल का जवाब भविष्य की गर्त में छिपा है।

कांग्रेस का आजाद भारत में दबदबा

आजादी के बाद से कांग्रेस ही अधिकांश समय केंद्र में सरकार बनाती आई है। सिर्फ केंद्र ही नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों में भी कांग्रेस ही तूती बोलती थी। कांग्रेस ने केंद्र में आधा दजर्न बार अपने बहुमत से सरकार बनाई, तो चार बार गठबंधन सरकार बनाई। कांग्रेस ने केंद्र को अब तक सात प्रधानमंत्री दिए हैं। हालांकि कांग्रेस अब सिकुड़ रही है और इसी बात को समझते हुए पार्टी हाईकमान ने नेतृत्व में बदलाव का फैसला लिया है। 

राहुल की चुनौतियां

सबसे पहले तो उन्हें कांग्रेस मतलब गांधी परिवार के मिथक को तोड़ना होगा। इसके लिए उन्हें नए-नए चेहरों को न सिर्फ भरपूर मौका देना होगा, बल्कि मणिशंकर अय्यर के उस बयान को भी झूठा साबित करना होगा, जिसमें मणि ने कहा था, 'कांग्रेस में सिर्फ दो लोग ही अध्यक्ष बन सकते हैं-मां या बेटा।' उन्हें ज्योतिरादित्य सिधिंया और सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं को आगे लाना होगा। इसके लिए उन्हें सोनिया के विश्वासपात्र नेताओं से न सिर्फ दूरी बनानी होगी, बल्कि उनकी सोच नहीं, अपनी सोच से चलना होगा। राहुल गांधी ने ऐसे कई मुद्दे उठाए, जो न सिर्फ प्रभावी थे, बल्कि आम आदमी से जुड़े भी थे। यह अलग बात है कि एक-दो बार बयानबाजी कर राहुल शांत हो गए। उन्हें अब इससे बचना होगा और मसलों या मुद्दों को अंजाम तक पहुंचाना होगा। कांग्रेस की अल्पसंख्यक या दलित वोट पर निर्भरता खत्म कर सभी के लिए समग्र सोच वाले एजेंडे पर चलना होगा।

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