पढऩे-सुनने में अजीब लगा ना. लेकिन सच है. इसका अहसास मुझे भी हुआ. कुछ-एक दिन पहले लखनऊ के एक प्रतिष्ठित क्लब में जाना हुआ. मेरे साथ एमएनसी में काम करने वाले बाहर से आए कुछ दोस्त थे. वे फॉर्मल ड्रेस में थे लेकिन मैं स्पोट्र्स शूज पहने था. बस रिसेप्शन पर इसी कारण रोक लिया गया. कहा गया लेदर शूज पहनने होंगे. मरता क्या न करता बीस रुपए देकर वहीं से किराए के लेदर शूज लिए और क्लब के अंदर चला गया. लेकन यह बात मन में कौंधती रही. रात को घर लौटा तो ऐसी ही एक और घटना वेट कर रही थी. एक इंग्लिश न्यूज चैनल पर मद्रास हाईकोर्ट के जज और दो सीनियर एडवोकेट की खबर फ्लैश हो रही थी. खबर के मुताबिक इन तीन लोगों को महज धोती और स्लीपर्स पहने होने के कारण तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन (टीएनसीए) की बिल्डिंग में प्रवेश नहीं दिया गया. मुझे अपने साथ पेश आई घटना याद हो आई. लगा कि जब हाईकोर्ट के जज को रोका जा सकता है, तो मेरी बिसात ही क्या है.
अगले दिन मेरे मन में यह बात गहरे पैठ चुकी थी कि 'रूल इज रूलÓ के नाम पर ऐसी कितनी घटनाएं हुईं, उनके बारे में जानकारी की जाए. नतीजतन सबसे पहले हाथ लगा न्यूयॉर्क टाइम्स के आर्काइव में ३ जुलाई १९९८ को प्रकाशित सुनंदा के. दत्ता राय का लेख. इसमें अपने शहर के पड़ोसी जिले यानी कानपुर के एक वाकये का जिक्र मिला. इस वाकये के मुताबिक १९६३ में एरिक न्यूबाय नामक इंग्लिश ट्रैवल राइटर कानपुर क्लब पहुंचे. उन्होंने वहां एक रूम की दरकार की, तो रिसेप्शनिस्ट, जो कि खुद एक इंडियन था, ने उनसे क्लब के एक मेंबर का इंट्रोडक्शन मांगा. जवाब में एरिक साहब ने तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर जवाहर लाल नेहरू का लेटर ऑफ इंट्रोडक्शन दिखाया, लेकिन रिसेप्शनिस्ट ने यह कह कर रूम देने से इंकार कर दिया कि नेहरूजी उनके क्लब के मेंबर नहीं हैं. है न कमाल. ब्रिटिश काल के उस क्लब के रूल्स एंड रेग्युलेशंस तब आजादी के १६ साल बाद भी जारी थे.
कुछ साल पहले दिल्ली जिमखाना क्लब में धोती पहने एक युवा सांसद को इसी कारण रोक दिया गया था, तो कुछ और साल पहले महान चित्रकार एमएफ हुसैन साहब को बॉम्बे जिमखाना में प्रवेश नहीं दिया गया. महज इसलिए कि उन्होंने नंगे पैर चलने का अपना नियम तोडऩे से इंकार कर दिया था. २००२ की ही बात है बेंगलुरू के नेशनल लॉ स्कूल के हेड प्रोफेसर जी मोहन गोपाल को बैंगलोर क्लब में घुसने नहीं दिया. वजह बनी उनकी धोती. वह भी उस दिन जब वह वहां गणतंत्र दिवस समारोह के गणमान्य अतिथि बतौर पहुंचे थे. इसी क्लब में इस घटना के एक साल पहले सत्यजीत रे के भतीजे अशोक चटर्जी को इसी 'गुनाहÓ की सजा भुगतनी पड़ी थी.
आजाद भारत का यह एक दुर्भाग्य कह सकते हैं कि ड्रेस कोड के नाम पर आज भी लगभग हर सिटी के चुनिंदा क्लब्स में अंग्रेजियत ही हावी है. संभवत: इसकी वजह इन क्लब्स का ब्रिटिश काल से जुड़ा होना हैै. उस दौर में ऐसे क्लब में इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट अलाउड की तख्तियां लगी रहती थी. यानी उस दौर में इन क्लब में जाने वाले समाज के एलीट ही हुआ करते थे. लेकिन आजाद भारत में अब ऐसी परंपरा का क्या औचित्य? खासकर जब हमारा संविधान सभी को बराबरी का अधिकार देता है. मौलिक अधिकारों के इस दौर में क्या किसी खास पोशाक पहने होने के कारण आपके साथ भेदभाव किया जा सकता है? वह भी सिर्फ इसलिए कि भेदभाव करने वाले स्वयं को पहनावे के कारण श्रेष्ठ मानते हैं.
एक और वाकया बताना चाहूंगा. बात उस दौर की है जब संविधान सभा में मौलिक अधिकारों के दायरे पर चर्चा चल रही थी. रोहिणी कुमार चौधरी ने अंग्रेजों के बनाए भेदभाव संबंधी नियम-कानूनों में संशोधन की बात की थी. उनका आशय तत्कालीन अंग्रेजों के जमाने के क्लबों में लागू ड्रेस कोड से था. इस पर सरदार पटेल ने इस संशोधन प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा था कि वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिससे दुनिया में संदेश जाए कि हमें अपने ही नागरिकों के साथ व्यवहार करना नहीं आता.
आज लगता है कि रोहिणी कुमार का आशंकाएं सच साबित हो रही हैं. लगभग हर एलीट क्लब में ड्रेस कोड के नाम पर तमाम नियम कायदे लागू हैं. यहां तक सिटी में होने वाले सोशल इवेंट्स तक में ड्रेस कोड का पालन करने वाला निर्देश बड़े अक्षरों में लिखा होता है. ऐसा लगता है कि अंग्रेज तो चले गए, लेकिन उनकी आम भारतीयों के साथ भेदभाव करने वाली नीतियां आज भी जारी हैं. ऐसे में जयललिता तमिल संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसे क्लब के लिए ड्रेस कोड संबंधी नया कानून लाने जा रही हैं. क्या शेष राज्य भी भारतीयता को अंगीकार कर चलने वाले नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए कुछ ऐसा ही कदम उठाएंगे. अंग्रेजी को तरजीह देने वाले इस समाज से यह उम्मीद बेमानी सी लगती है. क्या कहते हैं आप...
अगले दिन मेरे मन में यह बात गहरे पैठ चुकी थी कि 'रूल इज रूलÓ के नाम पर ऐसी कितनी घटनाएं हुईं, उनके बारे में जानकारी की जाए. नतीजतन सबसे पहले हाथ लगा न्यूयॉर्क टाइम्स के आर्काइव में ३ जुलाई १९९८ को प्रकाशित सुनंदा के. दत्ता राय का लेख. इसमें अपने शहर के पड़ोसी जिले यानी कानपुर के एक वाकये का जिक्र मिला. इस वाकये के मुताबिक १९६३ में एरिक न्यूबाय नामक इंग्लिश ट्रैवल राइटर कानपुर क्लब पहुंचे. उन्होंने वहां एक रूम की दरकार की, तो रिसेप्शनिस्ट, जो कि खुद एक इंडियन था, ने उनसे क्लब के एक मेंबर का इंट्रोडक्शन मांगा. जवाब में एरिक साहब ने तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर जवाहर लाल नेहरू का लेटर ऑफ इंट्रोडक्शन दिखाया, लेकिन रिसेप्शनिस्ट ने यह कह कर रूम देने से इंकार कर दिया कि नेहरूजी उनके क्लब के मेंबर नहीं हैं. है न कमाल. ब्रिटिश काल के उस क्लब के रूल्स एंड रेग्युलेशंस तब आजादी के १६ साल बाद भी जारी थे.
कुछ साल पहले दिल्ली जिमखाना क्लब में धोती पहने एक युवा सांसद को इसी कारण रोक दिया गया था, तो कुछ और साल पहले महान चित्रकार एमएफ हुसैन साहब को बॉम्बे जिमखाना में प्रवेश नहीं दिया गया. महज इसलिए कि उन्होंने नंगे पैर चलने का अपना नियम तोडऩे से इंकार कर दिया था. २००२ की ही बात है बेंगलुरू के नेशनल लॉ स्कूल के हेड प्रोफेसर जी मोहन गोपाल को बैंगलोर क्लब में घुसने नहीं दिया. वजह बनी उनकी धोती. वह भी उस दिन जब वह वहां गणतंत्र दिवस समारोह के गणमान्य अतिथि बतौर पहुंचे थे. इसी क्लब में इस घटना के एक साल पहले सत्यजीत रे के भतीजे अशोक चटर्जी को इसी 'गुनाहÓ की सजा भुगतनी पड़ी थी.
आजाद भारत का यह एक दुर्भाग्य कह सकते हैं कि ड्रेस कोड के नाम पर आज भी लगभग हर सिटी के चुनिंदा क्लब्स में अंग्रेजियत ही हावी है. संभवत: इसकी वजह इन क्लब्स का ब्रिटिश काल से जुड़ा होना हैै. उस दौर में ऐसे क्लब में इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट अलाउड की तख्तियां लगी रहती थी. यानी उस दौर में इन क्लब में जाने वाले समाज के एलीट ही हुआ करते थे. लेकिन आजाद भारत में अब ऐसी परंपरा का क्या औचित्य? खासकर जब हमारा संविधान सभी को बराबरी का अधिकार देता है. मौलिक अधिकारों के इस दौर में क्या किसी खास पोशाक पहने होने के कारण आपके साथ भेदभाव किया जा सकता है? वह भी सिर्फ इसलिए कि भेदभाव करने वाले स्वयं को पहनावे के कारण श्रेष्ठ मानते हैं.
एक और वाकया बताना चाहूंगा. बात उस दौर की है जब संविधान सभा में मौलिक अधिकारों के दायरे पर चर्चा चल रही थी. रोहिणी कुमार चौधरी ने अंग्रेजों के बनाए भेदभाव संबंधी नियम-कानूनों में संशोधन की बात की थी. उनका आशय तत्कालीन अंग्रेजों के जमाने के क्लबों में लागू ड्रेस कोड से था. इस पर सरदार पटेल ने इस संशोधन प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा था कि वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिससे दुनिया में संदेश जाए कि हमें अपने ही नागरिकों के साथ व्यवहार करना नहीं आता.
आज लगता है कि रोहिणी कुमार का आशंकाएं सच साबित हो रही हैं. लगभग हर एलीट क्लब में ड्रेस कोड के नाम पर तमाम नियम कायदे लागू हैं. यहां तक सिटी में होने वाले सोशल इवेंट्स तक में ड्रेस कोड का पालन करने वाला निर्देश बड़े अक्षरों में लिखा होता है. ऐसा लगता है कि अंग्रेज तो चले गए, लेकिन उनकी आम भारतीयों के साथ भेदभाव करने वाली नीतियां आज भी जारी हैं. ऐसे में जयललिता तमिल संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसे क्लब के लिए ड्रेस कोड संबंधी नया कानून लाने जा रही हैं. क्या शेष राज्य भी भारतीयता को अंगीकार कर चलने वाले नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए कुछ ऐसा ही कदम उठाएंगे. अंग्रेजी को तरजीह देने वाले इस समाज से यह उम्मीद बेमानी सी लगती है. क्या कहते हैं आप...
अपने लेख काे इस प्रकाशित कर उन्हें भ्ाी अपने विचारों से ऐसे ही अवगत कराएं जो आई नेक्स्ट खरीद सकने की जद से दूर हैं। शुक्र है कि आपने मेरी इस सलाह को स्वीकारा। बेहतरीन लेखन के लिए साधुवाद।
ReplyDeleteyour Post Is OSM And Helpfull me . Thanx For This Post. Lots Of Love And Respect
ReplyDeleteAnshu Choudhary
Sonam gurjari
Donal bisht
Ramneek Sidhu
Meenu Prajapati