Saturday, December 23, 2017

अपनी योग शक्ति से ‘मनहूस नोएडा’ का दाग धो डालेंगे योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नोएडा किसी नासूर से कम नहीं है। राज्य के मुख्मंत्री पद पर विराजमान जो-जो नेता नोएडा आया, उसे इसकी कीमत सीएम की कुर्सी खोकर चुकानी पड़ी। मनहूस नोएडा के इस नकारात्मक प्रभाव का ही असर रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई मौकों पर नोएडा आने से कतराए। ऐसे में 25 दिसंबर को नोएडा मेट्रो के उद्घाटन के अवसर पर उपस्थित रहने का संकेत देकर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तमाम चर्चाओं को जन्म दे दिया है। इनमें से एक तो यही है कि क्या योगी अपनी योग शक्ति के बलबूते नोएडा के साथ जुड़ा मनहूसियत का दाग धो सकेंगे।
नोएडा से जुड़ी इस मनहूस छवि की शुरुआत 1988 में हुई, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को अपने नोएडा दौरे के कुछ समय बाद ही सीएम पद छोड़ना पड़ गया। उस वक्त तो किसी ने इस नकारात्मक संयोग को तवज्जो नहीं दी। हालांकि अगले ही साल यानी 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के साथ भी जब ऐसा ही हुआ कि नोएडा आने के तुरंत बाद उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी, तो नोएडा से जुड़े नकारात्मक दुर्योग की चर्चाएं तेज हुईं।
मुलायम सिहं के कायर्काल में भी ऐसा ही घटनाक्रम सामने आने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को नोएडा का नाम किसी खतरे की घंटी से कम नहीं लगने लगा था। अभूतपूर्व गठबंधन में छह-छह महीने के लिए मुख्यमंत्री पद का बंटवारा कर उत्तर प्रदेश की सियासत ने सपा-बसपा का मिलन कराया था। लेकिन 1995 में बतौर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह नोएडा दौरे पर आए। वापसी के कुछ महीने बाद ही उन्हें अपनी कुर्सी खोनी पड़ी।
इसके बाद भाजपा ने बसपा को समर्थन दिया और मायावती फिर से एक बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने इस नकारात्मक दुर्योग को तोड़ने की कोशिश की और 1997 में नोएडा दौरे पर आईं। नतीजा फिर वही निकला और उन्हें मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। भाजपा से दुश्मनी हुई सो अलग। फिर 1999 में कल्याण सिंह सीएम बने और उनके साथ भी नोएडा दौरे के बाद यही हश्र हुआ।
अब तक यह सिद्ध हो चुका था कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान शख्स के लिए नोएडा न सिर्फ मनहूस है, बल्कि कुर्सी खाऊ भी है। 2007 के चुनाव में मायावती उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व सीटों के साथ फिर से मुख्यमंत्री बनीं। वह 2011 में दलित प्रेरणा स्थल के उद्घाटन के लिए नोएडा आईं और अगले ही साल हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी द्वारा अखिलेश यादव को चेहरा बनाकर लड़े गए चुनाव में सत्ता गंवा बैठीं।
इसके बाद तो मुख्यमंत्रियों ने नोएडा आने से परहेज किया। इस कड़ी में भी भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। 2001 में उप्र के सीएम रहते राजनाथ सिंह ने डीएनडी फ्लाय ओवर के उद्घाटन के लिए नोएडा के बजाय दिल्ली को चुना था।
2012 में भी बहुमत से उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुए युवा मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह ने तो नकारात्मक दुर्योग के चलते कई बार नोएडा आने से परहेज किया। उन्होंने यमुना एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन से लेकर एशियन डेवलपमेंट बैंक की बैठक तक में आने से इंकार कर दिया। यहां तक कि अकलाख हत्याकांड के बाद उन्होंने बजाए दादरी जाने के अकलाख के परिजनों को लखनऊ बुलाकर उनसे मुलाकात की थी।

ऐसे में नोएडा के इस मनहूस दाग को जानते-बूझते भी अगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ 25 दिसंबर को नोएडा आ रहे हैं, तो सभी की निगाहें उन पर रहनी स्वाभाविक ही हैं। चर्चा है कि योगी अपनी योग शक्ति के बलबूते नोएडा के माथे पर लगे इस कलंक को न सिर्फ हमेशा के लिए मिटा देंगे, बल्कि उत्तर प्रदेश को भी विकास का मॉडलबतौर पेश करने में कामयाब रहेंगे।
 

Friday, December 15, 2017

भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण, तो कांग्रेस के लिए राहत बनेंगे गुजरात परिणाम

इसमें कतई कोई शक नहीं है कि गुजरात चुनाव परिणाम भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे। कांग्रेस के संदर्भ में बात करें तो गुजरात में सफलता या नजदीकी सफलता भी उसके लिए पुनर्जीवन और नई ऊर्जा का वायस बनेगी। वहीं, भाजपा के लिए ऐसा होने पर कहीं अधिक चिंता होगी। कारण, ऐसा होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को धक्का पहुंचेगा और यह इस बात का परिचायक होगा कि विकास पुरुष का उनका नारा फीका पड़ रहा है। आम लोगों ने आर्थिक मोर्चे पर उनकी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को नकार दिया है।
इतना तय है कि 2017 का गुजरात चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए कई मायनों में बेहद खास रहेगा। यूं कहें कि भारतीय राजनीति इसे कई कारणों से याद रखेगी। 2014 लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को गुजरात में पहली बार मजबूत चुनौती मिली। बिहार में नीतीश कुमार का विकास पुरुष की छवि तो पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की निजी छवि समेत शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ गुस्सा उसे ले डूबा था।
गुजरात में भाजपा लगभग दो दशकों से अधिक से सत्ता में है। अगर 2002 विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो वह पूरी तरह से सांप्रदायिक रहे। 2007 विधानसभा चुनाव तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के गुजरात मॉडल पर लड़े गए और परिणाम भजपा के खाते में गए। 2012 में नरेंद्र मोदी के भावी प्रधानमंत्री बनने के कारण लगभग एकतरफा रहे। लेकिन 2017 के चुनाव कई मायनों में भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। पहले तो भाजपा का प्रबल समर्थक पाटीदार समाज उससे दूर छिटका। युवाओं में बेरोजगारी का मुद्दा छाया रहा, तो नोटबंदी और जीएसटी ने परंपरागत भाजपाई मतदाता व्यापारी वर्ग को भी नाराज कर दिया। इन तमाम मोर्चों पर जूझते हुए भाजपा को हार्दिक पटेल, जिग्नेश मवानी और अल्पेश ठाकुर के रूप में उभरे क्षेत्रीय क्षत्रपों के दांव-पेंच भी झेलने पड़े।
भविष्य के लिहाज से भाजपा गुजरात का किला ढहते हुए नहीं देख सकती। उसे अगले साल चार विधान सभा चुनावों का सामना करना है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की ही सरकार है और लगातार कई सालों से है। इसके अलावा कर्नाटक में चुनाव होने हैं। कुल मिलाकर इन चार राज्यों की 744 सीटें 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए काफी निर्णायक करार दी जा सकती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, समेत पार्टी अध्यक्ष अमित शाह समेत तमाम दिग्गज भाजपाई गुजरात में डेरा डाले रहे। स्वभाविक है भाजपा को गुजरात के परिणामों की गूंज का अहसास है और उसने इसी के सापेक्ष न सिर्फ अपनी सारी शक्ति झोंक दी, बल्कि साम-दाम-दंड-भेद की नीति भी अपना ली।
रहा सवाल कांग्रेस का, तो उसके लिए राहत की बात यह है कि गुजरात में सफलता या नजदीकी सफलता भी राहुल गांधी के कद को एक झटके में बहुत बड़ा कर देगी। इस तस्वीर के आलोक में अगर यह कहा जाए कि इसके साथ ही राहुल 2019 के प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो जाएंगे, तो गलत नहीं होगा। उनके लिए राहत की बात यह है कि राहुल गांधी के तेवरों में गुजरात में तीखापन और सटीकता नजर आई है। उनके भविष्य के लिहाज से यह एक सुखद संकेत हैं।

तो अब इंतजार 18 दिसंबर का है, जब गुजरात का असल चेहरा सामने आएगा। हां, गुजरात में दूसरे चरण का मतदान खत्म होने के साथ ही कई एक्जिट पोल आए, लेकिन उन्हें बिल्कुल सही करार देना बेहद जल्दबाजी होगा। इसकी एक बड़ी वजह यही है कि बड़े से बड़े सीफोलॉजिस्ट को एक न एक बार मुंह की खानी पड़ती है। और, गुजरात चुनाव परिणाम उनके लिए कुछ ऐसा ही साबित हो सकते हैं।
 

Wednesday, December 6, 2017

सबसे पहले राजीव ने किया ‘राम राज्य’ का वादा, 1989 में कराया राम मंदिर का शिलान्यास

भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपने संस्मरणों के दूसरे भाग द टर्ब्यूलेंट यर्स: 1980-96 में प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के दिनों की यादों को ताजा किया है। उन्होंने इस किताब में अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के ताला खुलवाने के निर्णय को न सिर्फ गलत निर्णय करार दिया, बल्कि उस प्रकरण को पूर्ण विश्वासघात भी करार दिया। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आए थे। उस वक्त उनके प्रमुख रणनीतिकार अर्जुन सिंह ने 1989 में चुनावी जीत के लिए हिंदुओं के ध्रुवीकरण को सर्वोच्च प्रथामिकता दी थी। इस फेर में कांग्रेस लगातार गलती पर गलती करती गई।
शुरुआत की उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीर बहादुर सिंह पर 1986 में दबाव बनाकर विवादास्पद ढांचे का ताला खुलवाकर। इसके बाद 10 नवंबर 1989 को शिलान्यास कार्यक्रम कर बकायदा पूजा-अर्चना की शुरुआत भी कांग्रेस के शासन में ही हुई। उस समय उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक आरपी जोशी हुआ करते थे। उनकी गिनती नियम-कायदों से चलने वाले अधिकारियों में होती थी। आरपी जोशी ने भी एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता से निजी बातचीत में स्वीकार किया था, केंद्र सरकार के निर्णय से उनके हाथ बंधे हुए थे और उनके पास दिल्ली और लखनऊ का आदेश मानने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था।
उस वक्त राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। बूटा सिंह गृह मंत्री हुआ करते थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर नारायण दत्त तिवारी विराजमान थे। हिदूं वोटो के ध्रुवीकरण के लिए राजीव गांधी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत अयोध्या से राम राज्य लाने के वादे से की थी। हालांकि उस वक्त यह बहुत बड़ा रहस्य था कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की सिरे से अवहेलना कर आखिर शिलान्यास कार्यक्रम को अंजाम कैसे दिया गया। सर्वोच्च अदालत के ही आदेश ने विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों के विवदास्पद ढांचे पर कुछ करने से रोका हुआ था।
उस वक्त राजनीतिक गलियारों में कई सवाल तैरा करते थे। मसलन, क्या राजीव गांधी एनडी तिवारी के साथ निजी तौर पर इस पूरे प्रकरण को अंजाम देने में शामिल थे? हालांकि उस प्रकरण का राज खोला विद्रोही के अवतार में सामने आए एनडी तिवारी ने। 1995 में एनडी तिवारी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था। उनकी जद्दोजेहद अपनी खोई राजनीतिक जमीन की तलाश की ही थी। ऐसे ही मोड़ पर उन्होंने 1989 में शिलान्यास का राज खोला।
इस राज से साफ हो गया था कि राम मंदिर विवाद को हवा देने में कांग्रेस का ही हाथ रहा। एनडी तिवारी के मुताबिक उक्त दोनों ही मामलों में बूटा सिंह ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। पता चला कि अयोध्या में शिलान्यास से ठीक एक हफ्ते पहले बूटा सिंह ने गोरखपुर में राजीव गांधी की देवराह बाबा से मुलाकात कराई थी। इसकी गुपचुप व्यवस्था उत्तर प्रदेश के एक शीर्ष आईपीएस अधिकारी ने कराई थी, जो खुद बाबा के परम भक्त थे।
देवराह बाबा का उत्तर प्रदेश में जबर्दस्त प्रभाव था। यही नहीं, वह अपने भक्तों के माथे पर अपना पैर छुआ कर आशीर्वाद देने के लिए भी प्रसिद्ध थे। बताते हैं राजीव गांधी ने न सिर्फ बाबा का आशीर्वाद लिया, बल्कि अयोध्या मसले पर बाबा की राय भी मानी। बाबा ने राजीव गांधी से सिर्फ एक ही वाक्य कहा था, बच्चा हो जाने दे। बकौल एनडी तिवारी और नवंबर 1989 को शिलान्यास बच्चे ने हो जाने दिया




एक समय शशि कपूर पैसे नहीं होने पर बेचनी पड़ी थी अपनी स्पोर्ट्स कार

शशि कपूर को जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया, तो उनके बेटे कुणाल कपूर ने कहा था कि उन्हें यह सम्मान तो बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। कुणाल गलत नहीं थे। अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के नाटकों से अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत करने वाले शशि कपूर ने कई हिट फिल्में दीं और अपने समय के सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के साथ काम करते हुए भी अपनी पहचान खोने नहीं दी। यही नहीं, पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर के बाद दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त करने वाले शशि कपूर खानदान के तीसरे शख्स रहे।

जब बेचनी पड़ी स्पोर्टस कार

बहुत कम लोग जानते होंगे कि कपूर परिवार का चश्म-ओ-चिराग होने के बावजूद शशि कपूर के जीवन में एक समय ऐसा भी आया था, जब उनके पास पैसे नहीं थे। इस वजह से उन्हें अपनी बेहद प्रिय स्पोर्ट्स कार तक बेचनी पड़ी थी। यह स्थिति तब आई जब साठ और सत्तर के दशक में शशि इतने व्यस्त कलाकार के थे कि उन्हें कमिटमेंट पूरे करने के लिए एक दिन में आधा दर्जन शिफ्ट तक करनी पड़ीं।

सहायक निर्देशक बने, फिर आए अभिनय के मैदान में
शशि कपूर ने अपने बड़े बेटे कुणाल कपूर के जन्म के बाद 1961 में धर्मपुत्रके साथ बतौर नायक फिल्मी पारी शुरू की। उसी साल उनकी चार दिवारी फिल्म भी प्रदर्शित हुई। इसके पहले शशि कपूर पिता पृथ्वीराज कपूर के नाटकों में अभिनय के अलावा सुनील दत्त की पहली फिल्म पोस्ट बॉक्स 999, गेस्ट हाउस, दुल्हा-दुल्हन और राज कपूर अभिनीत श्रीमान सत्यवादी में सहायक निर्देशक रह चुके थे। शशि कपूर ने अपने जीवन में लगभग 120 फिल्मों में काम किया। इनमें से बतौर नायक 61 फिल्में कीं और 55 मल्टी स्टारर फिल्में। इसमें अमिताभ बच्चन के साथ एक दर्जन के आसपास फिल्में कीं। इनमें भी त्रिशूल, रोटी कपड़ा और मकान,  सुहाग, सिलसिला नमक हलाल आदि प्रमुख हैं। शशि कपूर ने ही अजूबा भी निर्देशित की थी। शशि कपूर ने हेमा मालिनी, परवीन बॉबी, राखी के साथ जोड़ी बनाई तो मौसमी चटर्जी भी उनकी नायिका रहीं। नंदा उनकी प्रिय नायिका थीं, जिन्हें वह अपना मेंटर भी बताते रहे।

अपने प्रोडक्शन हाउस से दीं यादगार फिल्में
1978 में शशि कपूर ने अपना प्रोडक्शन हाउस खोला। इसके साथ ही शशि ने जुनून, कलयुग, 36 चौरंगी लेन, विजेता और उत्सव जैसी कालजयी फिल्में दीं। 1987 के बाद से शशि कपूर ने बतौर चरित्र कलाकार कम फिल्में करनी शुरू कर दी थीं। हालांकि वह हॉलीवुड के लोकप्रिय बांड पियर्स ब्रॉसनन के साथ द डिसीवर्स में भी नजर आए थे। उनका हालिया यह यू कहें कि अंतिम फिल्म जिन्ना और मर्चेंट आइवरी की साइड स्ट्रीट थी। नब्बे के अंत में उन्होंने फिल्मी दुनिया से संन्यास ले लिया और फिर किसी फिल्म में नहीं नजर आए।

परिवार के साथ बिताया हर रविवार
फिल्मी जीवन और पारिवारिक जीवन को अलग रखने में सिद्धहस्त हो चुके शशि कपूर ने कभी भी रविवार को काम नहीं किया। यह दिन उनका परिवार के साथ ही बीतता था। यही नहीं, परिवार के साथ कोई खलल नहीं डाले इसलिए शशि ने कभी भी किसी मेहमान को रविवार को घर पर आमंत्रित नहीं किया। यही नहीं, अगर किसी फिल्म की शूटिंग विदेश में या आउटडोर होनी होती तो वह कोशिश करते थे कि शूटिंग की डेट्स बच्चों के स्कूल की छुट्टियों से मेल खा जाएं। वह भले ही रात में कितने ही बजे क्यों न सोए हों, लेकिन हर रोज सुबह का नाश्ता उन्होंने 7.30 बजे ही किया।
शशि कपूर ने जैनिफर किंडल से लव मैरिज की थी, जिनसे उन्हें तीन संतानें हुई कुणाल कपूर, करण कपूर और संजना कपूर। जैनिफर के साथ मिलकर ही उन्होंने पृथ्वी थिएटर के लिए शेक्सपियरवाला नाटक किया। आज शशि कपूर के रूप में हिंदी फिल्म उद्योग ने एक महान अभिनेता और इंसान खो दिया।



Saturday, December 2, 2017

अमित शाह की छवि बिगाड़ने-संवारने का खेल

देश के चर्चित और हाईप्रोफाइल मामले सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर की सुनवाई कर रहे सीबीआई के स्पेशल जज जस्टिस ब्रजगोपाल हरकिशन लोया की रहस्यमयी मौत को तीन साल हो रहे हैं। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह मुख्य आरोपी थे, जिन्हें बाद में बरी कर दिया गया था। खैर, लगभग सप्ताह भर पहले द कारवां पत्रिका ने जस्टिस लोया के परिजनों से बातचीत के आधार पर एक सनसनीखेज रहस्योद्घाटन करते हुए एक लेख प्रकाशित किया। इसके तहत जस्टिस लोया की मौत पर तमाम सवाल खड़े किए गए थे। जस्टिस लोया की बहन और पिता के हवाले से यह आरोप भी सामने आया कि चीफ जस्टिस मोहित शाह ने कथित तौर पर अमित शाह के पक्ष में फैसला करने के एवज में 100 करोड़ रुपए का आफर किया था। द कारवां में आनलाइन प्रकाशित लेख के जवाब में सोमवार को इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट से जस्टिस लोया की मौत पर द कारवां की रिपोर्ट को ही सिर से खारिज कर दिया।
अब गुजरात चुनाव की पृष्ठभूमि में द कारवां और इंडियन एक्सप्रेस की जस्टिस लोया की मौत पर अलग-अलग एंगल से प्रकाशित रिपोर्ट मामले को एक नई रोशनी में पेश करती है। जिस देश में चुनाव के अवसर पर ही बोतल में बंद जिन्न बाहर आते हों, वहां एक का अमित शाह को कठघरे में खड़ा करना और दूसरे का उन्हें अपरोक्ष रूप से बचाना दिल-ओ-दिमाग को मथता जरूर है। वह भी तब जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत कांग्रेस, वाम मोर्चा और दिल्ली उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस एपी शाह जस्टिस लोया की मौत की नए सिरे से जांच की मांग कर चुके हैं। उनकी यह मांग जस्टिस लोया की बहन और पिता के सामने आए बयानों पर ही आधारित है। हालांकि द कारवां और  इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बावजूद कुछ अनसुलझे सवाल अभी भी हैं।
मसलन,
प्रश्न- जस्टिस लोया को अस्पताल कैसे लेकर गए?
जस्टिस लोया की बहन अनुराधा बियाणी और पिता हरकिशन लोया के मुताबिक उन्हें आए फोन के हिसाब से जस्टिस लोया को आटोरिक्शा में डांडे अस्पताल लेकर गए। बाद में नागपुर के दूसरे अस्पताल लेकर जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित किया गया।
विरोधाभास- अनुराधा के मुताबिक नागपुर के रवि भवन के पास एक भी आटो स्टैंड नहीं है। फिर आटोरिक्शा से जस्टिस लोया को अस्पताल कैसे लेकर गए। हालांकि मुंबई उच्च न्यायालय के जस्टिस भूषण गवई के मुताबिक स्थानीय जज विजय कुमार बर्डे अपनी कार में जस्टिस लोया को अस्पताल लेकर गए। द कारवां की रिपोर्ट में बर्डे का जिक्र आया है। जस्टिस लोया की दूसरी बहन ने इस नाम के शख्स से जस्टिस लोया की मौत का समाचार मिलने की बात कही है।
प्रश्न- ईसीजी मशीन की वस्तुस्थिति
विरोधाभास- जस्टिस लोया की बहन और पेशे से डाक्टर अनुराधा बियाणी की द कारवां से बातचीत के मुताबिक, अस्पताल की ईसीजी मशीन काम नहीं कर रही थी। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ईसीजी हुआ। अखबार ने इसके समर्थन में एक ईसीजी रिपोर्ट की फोटो भी छापी। यह अलग बात है कि उस रिपोर्ट में ब्रजमोहन लोहिया का नाम छपा है। यानी ईसीजी का रहस्य बरकरार है।
प्रश्न- पोस्टमार्टम रिपोर्ट की बातें
विरोधाभास- द कारवां के मुताबिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जस्टिस लोया की मौत का समय सुबह 6.15 बताया गया, जबकि उनके घर वालों के मुताबिक जस्टिस लोया की मौत की खबर उन्हें सुबह 5 बजे ही मिल गई थी। यही नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट के प्रत्येक पन्ने पर चचेरे भाई के तौर पर हस्ताक्षर हैं। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि डाक्टर प्रशांत राठी ने उक्त हस्ताक्षर किए। उन्हें ऐसा करने के निर्देश उनके चाचा रुक्मेश पन्नालाल जकोटिया ने दिए थे।
प्रश्न- जस्टिस लोया के शरीर पर खून के निशान
विरोधाभास- जस्टिस लोया की बहन के मुताबिक जस्टिस लोया की कमीज और शरीर के पिछले हिस्से में खून के निशान थे। द कारवां कहता है कि पोस्टमार्टम में खून नहीं निकलता है, क्योंकि दिल काम करना बंद कर चुका होता है। दोबारा पीएम कराने के सवाल पर डेडबाडी के साथ आए कुछ लोगों ने मसले को और न उलझाने की सलाह दी थी। यही नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ड्राय लिखा था। इंडियन एक्सप्रेस ने डाक्टर के हवाले से लिखा है कि पोस्टमार्टम में खून निकलता है।
प्रश्न- जस्टिस लोया का शव अकेले भेजा गया लातूर
विरोधाभास- द कारवां में अनुराधा बियाणी बताती हैं कि लातूर स्थित उनके घर जस्टिस लोया का शरीर एंबुलेंस का ड्राइवर लेकर पहुंचा था। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में जस्टिस गवई ने बताया कि उन्होंने दो कनिष्ट जजों को साथ जाने के निर्देश दिए थे। वे एंबुलेंस के पीछे एक कार में गए थे। रास्ते में कार में खराबी आ जाने से वह एंबुलेंस के पहुंचने के बाद पहुंचे थे।
प्रश्न- 100 करोड़ की रिश्वत का मामला
विरोधाभास- द कारवां के मुताबिक अनुराधा का कहना है कि मुंबई उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस मोहित शाह ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पक्ष में फैसला देने के लिए 100 करोड़ की पेशकश की थी। इंडियन एक्सप्रेस में जस्टिस गवई के मुताबिक, मोहित शाह जस्टिस लोया की मौत के बाद अस्पताल पहुंचे थे।

उक्त तमाम सवालों और जस्टिस लोया की मौत पर दो अलग-अलग रिपोर्ट से स्पष्ट है कि द कारवां की रिपोर्ट जहां भाजपा अध्यक्ष को कठघरे में खड़ा करती है, वहीं इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट अमित शाह को बचाती नजर आती है। एक ऐसे देश जहां आज तक सुभाष चंद्र बोस और लाल बहादुर शास्त्री की मौत के वास्तविक कारणों का अभी तक खुलासा नहीं हो सका है या आधुनिक संदर्भों की बात करें तो आरुषि तलवार हत्याकांड की असल वजह सामने नहीं आई है, वहां जस्टिस लोया की मौत एक और संदिग्ध मौत में तब्दील होकर इतिहास के पन्ने में दर्ज हो जाएगी। बस चुनाव के मौसम में राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से द कारवां और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की व्याख्या करेंगे। और इन्हीं दोनों के हिसाब से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में दोषी और निर्दोष बताते रहेंगे।



Sunday, November 26, 2017

हाफिज सईद की रिहाई पाकिस्तान के दोगलेपन का प्रतीक

जन्म के पहले से ही भारत को अपना दुश्मन मान चुके पाकिस्तान से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। नजरबंदी का उपयुक्त कारण पेश करने में अक्षम साबित हुई पाकिस्तान सरकार को अंतत: पंजाब न्यायिक बोर्ड के आदेश पर मुंबई हमलों के मास्टर माइंड और प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और फिलहाल जमात-उद-दावा के अमीर हाफिज सईद को रिहा करना पड़ा। हाफिज के मसले पर पाकिस्तान का रवैया शुरुआत से ही दोगलेपन का रहा। नजरबंदी के आदेश के वक्त भी सईद पर आतंक विरोधी कार्रवाई का नहीं अपितु मामूली कानून-व्यवस्था बिगड़ने के आरोप मढ़े गए थे। इन आरोपों के चलते 300 दिन से बंद हाफिज बुधवार को रिहा हो जाता है। वजह, पंजाब सरकार अदालत को न तो उसके खिलाफ कोई सबूत पेश कर पाती है और ना ही कोई और आरोप लगा पाती है। वह भी तब जब संयुक्त राष्ट्र समेत अमेरिका ने हाफिज सईद पर आतंकी कार्रवाई में लिप्त रहने के लिए 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा हुआ है।
जैसा अपेक्षित था शुक्रवार को लाहौर के जौहर शहर में हाफिज अपने घर के बाहर अपने समर्थकों से मिला। केक काटा, भारत विरोधी नारे लगाए और कश्मीर की आजादी का संकल्प लिया। हाफिज सईद की रिहाई यह भी बताती है कि लाख अंतर्राष्ट्रीय दबावों के पाकिस्तान आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगार बना रहेगा। भले ही तमाम अमेरिकी सिनेटर पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक मदद रोकने की मांग करें या इसके एवज में प्रभावी कदम उठाने की अपेक्षा जताए, पाकिस्तान आतंक को प्रायोजित करने की अपनी नीति से पीछे हटने वाला नहीं है। वह भी तब जब भारत संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम वैश्विक मंचों से आतंक के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान का कच्चा-चिट्ठा खोल चुका है और जमकर पाकिस्तानी हुक्मरानों समेत आईएसआई को खरी-खोटी सुना चुका है।
हाफिज की रिहाई जिन प्रावधानों के तहत हुई उस पर गौर करना भी जरूरी है। हाफिज के खिलाफ एक भी सुबूत पेश नहीं किया गया। यहां तक अजमल कसाब की स्वीकारोक्ति या मुंबई आतंकी हमलों से जुड़े सबूत भी अदालत के समक्ष नहीं रखे गए। यह तब है जब पाकिस्तान अखबार द डॉन के मुताबिक इसकी प्रबल संभावना थी कि पंजाब सरकार हाफिज के खिलाफ नए सबूत पेश कर उसकी गिरफ्तारी की अवधि बढ़वाने में सफल रहेगी।
हालांकि हाफिज की रिहाई को पाकिस्तान के बदले अंदरूनी हालातों से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। वहां अगले साल आमचुनाव होने हैं और पनामा पेपर के चलते प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने को मजबूर हुए नवाज शरीफ की ताकत क्षीण पड़ी है। ऐसे में पाकिस्तानी खुफिया संस्था आईएसआई हाफिज को रिहाई सुनिश्चित करती है, तो इसके भी अपने निहितार्थ हैं। वहां परोक्ष-अपरोक्ष रूप से सत्ता की चाबी सैन्य प्रतिष्ठान के हाथों ही रही है। नवाज शरीफ या उनसे पहले बेनजीर भुट्टो ने अपनी अलग राह चुनने की कोशिश की थी, तो दोनों ही का हश्र पूरी दुनिया देख चुकी है।
हालिया घटनाक्रम से इतना तो साफ हो गया है कि आतंक से खुद को पीड़ित बताने का पाकिस्तान का आलाप सिर्फ और सिर्फ दुनिया को गुमराह करने का एक छलावा भर है। उसकी न तो ऐसी इच्छा है और ना ही कोई इरादा। हाफिज सईद की रिहाई से पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार के लिए भी कम सिरदर्द पैदा नहीं होगा। साथ ही इस दोगलेपन के साथ पाकिस्तान ने एक बार फिर जता दिया है कि वह न सिर्फ आतंक की फैक्ट्री है, बल्कि एक तरह से आतंकवादियों द्वारा चलाया जा रहा देश भी। इस तरफ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को तुरंत ध्यान देना होगा। खासकर जब रिहा होते ही हाफिज सईद खुलेआम सड़कों पर भारत, अमेरिका के विरोध समेत कश्मीर की आजादी का नारा बुलंद करवा रहा है। यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हाफिज सईद को मुंबई आतंकी हमलों के ठीक बाद गिरफ्तार किया गया, लेकिन छह महीने बाद जून 1999 में उसे रिहा कर दिया गया था। दोगलेपन का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा...

Tuesday, November 21, 2017

पद्मावती का प्रदर्शन टालने का फैसला अमेरिका से आया, अब 2018 में आएगी

फिल्म को लेकर चल रही बयानबाजी और विरोध-प्रदर्शनों के बीच पद्मावती का प्रदर्शन टालने का फैसला निर्देशक संजय लीला भंसाली का नहीं था। यह निर्णय फिल्म के निर्माताओं का था, जिन्होंने भंसाली को सिर्फ सूचित भर किया।
भंसाली के बेहद करीबी निजी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक 'आने वाले महीनों में किसी और शुक्रवार' फिल्म को प्रदर्शित करने का फैसला उन्हें मोबाइल पर सुनाया गया। इसके जवाब में भंसाली ने सिर्फ 'ओके' कहकर फोन काट दिया। इस कॉल के साथ ही उनके लिए तय समय पर फिल्म के प्रदर्शन की लड़ाई खत्म हो गई।
'फिल्म के प्रदर्शन को टालने के संबंध में ना तो कोई सफाई भंसाली को दी गई और ना ही उन्होंने मांगी।' विवाद की इस लड़ाई में भंसाली की एक नहीं चली। अब उन्होंने पूरा मामला फिल्म के सक्षम निर्माताओं वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स के मजबूत हाथों में छोड़ दिया है। यह अलग बात है कि रविवार को इस बाबत कंपनी के अधिकृत बयान ने पद्मावती की पूरी की पूरी क्रू और स्टारकास्ट को झटका जरूर दे दिया।
चालू बयानबाजियों और राजनीति के बीच एक सवाल जरूर सिर उठा रहा है कि आखिर वायकॉम को त्वरित गति से यह निर्णय लेना क्यों पड़ा? एक सूत्र के मुताबिक एसएलबी (संजय लीला भंसाली) की ओर से रिकॉर्ड किए गए एक वीडियो रूपी सफाई के बावजूद मामला शांत होते नहीं देख वायकॉम प्रबंधन की पेशानी पर बल पड़ गए। इस वीडियो में भंसाली ने न सिर्फ रानी पद्मावती की महिमा का बखान किया, बल्कि यह आश्वासन भी दिया कि फिल्म में किसी तरह से किसी भी ऐतिहासिक शख्स का अपमान नहीं किया गया है। इस सफाई के बावजूद सामने आने वाली धमकियों और चेतावनियों की आंच वायकॉम के अमेरिका स्थित मुख्यालय तक जा पहुंची।
पद्मावती की विषयवस्तु में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है कि बारंबार सफाई के बावजूद विवाद भड़कता देखकर अमेरिकी मुख्यालय ने फिल्म का प्रदर्शन टालने का फैसला कर लिया।
यही नहीं, फिल्म से जुड़े विवादों को खत्म करने की आखिरी कोशिश वास्तव में ताबूत में आखिरी कील की तरह साबित हुई। यह कोशिश रही भंसाली के प्रोडक्शन की महत्वपूर्ण सदस्य शोभा संत की अर्णब गोस्वामी, रजत शर्मा समेत कुछ पत्रकारों को फिल्म दिखाने की। इसके बाद अर्णब की अपने शो पर दिलेरी, 'मैंने फिल्म देखी है, आपने नहीं' बैकफायर कर गई। यहीं से मामला और बिगड़ गया।
अंत में सीबीएफसी प्रमुख प्रसून जोशी के बयान ने रही सही कसर पूरी कर दी। पद्मावती को लेकर तेज हो रहे विवादों से प्रसून खासे दबाव में थे। ऐसे में कुछ पत्रकारों को फिल्म दिखाना उन्हें रास नहीं आया और उन्होंने इसको लेकर अपनी नाखुशी सार्वजनिक कर दी।
सूत्र यह भी बताते हैं कि गुजरात चुनाव होने तक फिल्म का प्रदर्शन किसी सूरत में नहीं हो सकता था। ऐसे में फिल्म की पब्लिसिटी कॉस्ट भी बढ़नी तय थी। यही सभी देखकर वायकॉम के आलाकमान ने फिल्म के प्रदर्शन की तारीख बगैर किसी विलंब के टालने का फरमान जारी कर दिया।
अब क्या? सूत्र बताते हैं कि वायकॉम के नीति-निर्धारक फिलहाल किसी जल्दबाजी में नहीं है। वह स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और उसी के अनुरूप आगे का निर्णय करेंगे।