उत्तर प्रदेश की राजनीति में नोएडा किसी ‘नासूर’ से कम नहीं है।
राज्य के मुख्मंत्री पद पर विराजमान जो-जो नेता नोएडा आया, उसे इसकी कीमत ‘सीएम की कुर्सी’ खोकर चुकानी पड़ी। ‘मनहूस नोएडा’ के इस नकारात्मक
प्रभाव का ही असर रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई मौकों पर नोएडा आने
से कतराए। ऐसे में 25 दिसंबर को नोएडा मेट्रो के उद्घाटन के अवसर पर उपस्थित रहने
का संकेत देकर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तमाम चर्चाओं को
जन्म दे दिया है। इनमें से एक तो यही है कि क्या योगी अपनी योग शक्ति के बलबूते
नोएडा के साथ जुड़ा ‘मनहूसियत’ का दाग धो सकेंगे।
नोएडा से जुड़ी इस ‘मनहूस छवि’ की शुरुआत 1988 में
हुई, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को अपने नोएडा दौरे के कुछ समय बाद
ही सीएम पद छोड़ना पड़ गया। उस वक्त तो किसी ने इस ‘नकारात्मक संयोग’ को तवज्जो नहीं दी।
हालांकि अगले ही साल यानी 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के साथ भी जब
ऐसा ही हुआ कि नोएडा आने के तुरंत बाद उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी, तो नोएडा से
जुड़े ‘नकारात्मक
दुर्योग’ की
चर्चाएं तेज हुईं।
मुलायम सिहं के कायर्काल में भी ऐसा ही घटनाक्रम सामने आने पर उत्तर
प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को नोएडा का नाम किसी ‘खतरे’ की घंटी से कम नहीं
लगने लगा था। अभूतपूर्व गठबंधन में छह-छह महीने के लिए मुख्यमंत्री पद का बंटवारा
कर उत्तर प्रदेश की सियासत ने सपा-बसपा का मिलन कराया था। लेकिन 1995 में बतौर
मुख्यमंत्री मुलायम सिंह नोएडा दौरे पर आए। वापसी के कुछ महीने बाद ही उन्हें अपनी
कुर्सी खोनी पड़ी।
इसके बाद भाजपा ने बसपा को समर्थन दिया और मायावती फिर से एक बार
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने इस ‘नकारात्मक दुर्योग’ को तोड़ने की कोशिश
की और 1997 में नोएडा दौरे पर आईं। नतीजा फिर वही निकला और उन्हें मुख्यमंत्री पद
से हाथ धोना पड़ा। भाजपा से दुश्मनी हुई सो अलग। फिर 1999 में कल्याण सिंह सीएम
बने और उनके साथ भी नोएडा दौरे के बाद यही हश्र हुआ।
अब तक यह सिद्ध हो चुका था कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर
विराजमान शख्स के लिए नोएडा न सिर्फ मनहूस है, बल्कि ‘कुर्सी खाऊ’ भी है। 2007 के
चुनाव में मायावती उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व सीटों के साथ फिर से मुख्यमंत्री
बनीं। वह 2011 में दलित प्रेरणा स्थल के उद्घाटन के लिए नोएडा आईं और अगले ही साल
हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी द्वारा अखिलेश यादव को चेहरा बनाकर लड़े
गए चुनाव में सत्ता गंवा बैठीं।
इसके बाद तो मुख्यमंत्रियों ने नोएडा आने से परहेज किया। इस कड़ी में भी
भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह का नाम सबसे पहले जेहन में आता है।
2001 में उप्र के सीएम रहते राजनाथ सिंह ने डीएनडी फ्लाय ओवर के उद्घाटन के लिए नोएडा
के बजाय दिल्ली को चुना था।
2012 में भी बहुमत से उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुए युवा
मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह ने तो ‘नकारात्मक दुर्योग’ के चलते कई बार
नोएडा आने से परहेज किया। उन्होंने यमुना एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन से लेकर एशियन
डेवलपमेंट बैंक की बैठक तक में आने से इंकार कर दिया। यहां तक कि अकलाख हत्याकांड
के बाद उन्होंने बजाए दादरी जाने के अकलाख के परिजनों को लखनऊ बुलाकर उनसे मुलाकात
की थी।
ऐसे में नोएडा के इस ‘मनहूस दाग’ को जानते-बूझते भी
अगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ 25 दिसंबर को नोएडा आ रहे हैं, तो सभी की निगाहें
उन पर रहनी स्वाभाविक ही हैं। चर्चा है कि योगी अपनी योग शक्ति के बलबूते नोएडा के
माथे पर लगे इस कलंक को न सिर्फ हमेशा के लिए मिटा देंगे, बल्कि उत्तर प्रदेश को
भी ‘विकास
का मॉडल’ बतौर
पेश करने में कामयाब रहेंगे।






